दीपावली पर क्‍यों करते हैं गणेश-लक्ष्‍मी की पूजा, भूलकर भी ऐसी मूर्ति न खरीदें… जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

रायपुर 26 अक्टूबर 2019। दीपावली के दिन माता लक्ष्मी और श्रीगणपति की पूजा का बहुत महत्व है। इनकी पूजा के बिना यह त्योहार अधूरा रहता है। नई मूर्ति की पूजा-हर साल मूर्ति बदलने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कई लोग इसे मंदिर में मूर्ति बदलने का एक अवसर मानते हैं तो कुछ लोग लक्ष्मी-गणेश की नई मूर्ति की पूजा को धर्म से जोड़ते हैं। पुराने समय में सिर्फ धातु और मिट्टी की मूर्तियों का ही चलन था। धातु की मूर्ति से ज्यादा मिट्टी की मूर्ति की पूजा होती थी।  नई मूर्ति एक आध्यात्मिक विचार का भी संचार करती है दिवाली पर पूजा को लेकर हर साल लक्ष्मी और गणेश की नई मूर्ति की पूजा की जाती है। दिवाली पर पूजा के लिए नई मूर्ति खरीदने से घर में शुभता आती है। लेकिन अक्सर मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर दीपावली पर मां लक्ष्मी और गणेशजी की पूजा को अन्य देवताओं की अपेक्षा इतनी वरीयता क्यों दी जाती है? आइए, आज इसी प्रश्न का उत्तर और धार्मिक महत्व जानते हैं…

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दीपावली पर गणपति पूजा का महत्व

गणपति को बुद्धि के देवता कहा गया है। हिंदू धर्म में कोई पूजा और कर्मकांड गणपति की पूजा के बिना शुरू नहीं किया जाता। दीपावली पर गणपति पूजा की यह भी एक वजह है। साथ ही धन देवी की पूजा से समृद्धि का आशीर्वाद मिलने के बाद व्यक्ति को सद्बुद्धि की आवश्यकता होती है। ताकि वह धन का उपयोग सही कार्यों के लिए करे। इसी प्रार्थना के साथ दीपावली पर गणपति की पूजी की जाती है कि हे प्रथम पूजनीय गणपति हमें सद्बुद्धि प्रदान कर सन्मार्ग पर आगे बढ़ने का वरदान दें।

दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का महत्व

मां लक्ष्मी धन की देवी हैं, यह हम सभी जानते हैं। मां लक्ष्मी की कृपा से ही ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति होती है। कार्तिक अमावस्या की पावन तिथि पर धन की देवी को प्रसन्न कर समृद्धि का आशीर्वाद लिया जाता है। दीपावली से पहले आने वाले शरद पूर्णिमा के त्योहार का मां लक्ष्मी के जन्मोत्सव की तरह मनाया जाता है। फिर दीपावली पर उनका पूजन कर धन-धान्य का वर लिया जाता है।

रामायण में इस बात का प्रमुखता से उल्‍लेख किया गया है कि भगवान राम जब लंका के राजा रावण का वध करके पत्‍नी सीता और भ्राता लक्ष्‍मण के साथ अयोध्‍या आए थे तो उस दिन पूरी अयोध्‍या नगरी को दीपों की रोशनी से सजाया गया था। अपने प्रभु के आगमन पर अयोध्‍या में दीपावली मनाई गई थी, तब से दीपावली का पर्व मनाया जा रहा है।

क्या है धार्मिक विश्वास?
दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। जबकि इससे 15 दिन पूर्व कार्तिक मास की पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी का जनमोत्सव शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक रीति के अनुसार, मां लक्ष्मी की पूजा का मुख्य दिन शरद पूर्णिमा ही है जबकि दीपावली के दिन मां काली की पूजा मुख्य होनी चाहिए। इसका कारण यह है कि अमावस्या की रात मां कालरात्रि की रात होती है जबकि शरद पूर्णिमा की रात धवल रात होती है और लक्ष्मी जी का प्राकट्य दिवस भी होता है। शरद पूर्णिमा पर ही देवी लक्ष्मी समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से उत्पन्न हुईं थी।

अमावस्या तिथि का स्वरूप मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप से संबंधित है और शरद पूर्णिमा का धवल स्वरूप मां लक्ष्मी के स्वरूप से। इसलिए शरद पूर्णिमा पर देवी लक्ष्मी और दीपावली पर मां काली की पूजा करनी चाहिए। बदलते समय और बाजारवाद के हावी होने के साथ ही दीपावली पर लक्ष्मी पूजा को प्राथमिकता दी जाने लगी। हालांकि दीपावली पर मां लक्ष्मी,कालरात्रि, गणपति के साथ ही ब्रह्मा,विष्णु और महेश की पूजा की जानी चाहिए। पूजा के समय ब्रह्माजी के बाईं और देवी सरस्वती, विष्णु जी के बाईं और देवी लक्ष्मी और शिवजी के बाईं और मां पार्वती विराजित होनी चाहिए।

हमेशा ध्यान रखें कि लक्ष्मी गणेश कभी भी एक साथ जुड़े हुए नहीं खरीदने चाहिए। पूजाघर में रखने के लिए लक्ष्मी और गणेश की ऐसी मूर्ति लेने चाहिए, जिनमें दोनों विग्रह अलग-अलग हों।

– गणेश की मूर्ति में उनकी सूंड बाएं हाथ की तरफ मुड़ी होनी चाहिए। दायीं तरफ मुड़ी हुई सूंड शुभ नहीं होती है। सूंड में दो घुमाव भी न हों।

– मूर्ति खरीदते समय हमेशा गणेश जी के हाथ में मोदक वाली मूर्ति खरीदें। ऐसी मूर्ति सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

– गणेश जी की मूर्ति में उनके वाहन मूषक की उपस्थिति अनिवार्य है।

– सोने, चांदी, पीतल या अष्टधातु की मूर्ति खरीदने के साथ क्रिस्टल के लक्ष्मी-गणेश की पूजा करना शुभ होता है।

लक्ष्मी की मूर्ति खरीदते समय रखें ध्यान

– लक्ष्मी मां की ऐसी मूर्ति न खरीदें जिसमें मां लक्ष्मी उल्लू पर विराजमान हों। ऐसी मूर्ति को काली लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।

– लक्ष्मी माता की ऐसी मूर्ति ऐसी लेनी चाहिए जिसमें वो कमल पर विराजमान हों। उनका हाथ वरमुद्रा में हो और धन की वर्षा करता हो।

– कभी भी लक्ष्मी मां की ऐसी मूर्ति न लेकर आएं जिसमें वो खड़ी हों। ऐसी मूर्ति को लक्ष्मी मां के जाने की मुद्रा में तैयार माना जाता है।

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