कोल खदान से प्रभावित 20 गाँव के ग्रामीण पच्चीस दिनों से धरने पर.. वहीं जला रहे दिया.. वहीं मना रहे दिवाली

अंबिकापुर,29 अक्टूबर 2019।जिस हसदेव अरण्य के खनन में ग्रामीणों के विरोध को समर्थन देने 16 जून 2015 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मदनपुर आए थे, और ग्रामीणों के उस संघर्ष को समर्थन दिया था कि, अनुसूचित क्षेत्र में सर्वाधिकार ग्राम सभाओं को है, और पेसा एक्ट सर्वोपरि है, उस ईलाके में ग्रामीणों के घरों में दिए नहीं जल रहे हैं, बल्कि यह दिए उस आंदोलन स्थल पर जल रहे हैं जहा ग्रामीण अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। इन बीस गाँव के ग्रामीणों का संघर्ष आज भी जंगल ज़मीन को बचाने का जारी है। जबकि आप यह संघर्ष पढे तो यह भी ध्यान रखिए कि, आज अपना आंदोलन जारी रखने के लिए इन्हें जगह तक मुहैया नहीं हो रही है। पहले तारा गाँव में शुरु हुआ आंदोलन अब फ़तेहपुर में चल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि विरोध प्रदर्शन के शांतिपूर्ण तरीक़े पर भी प्रशासन की “ना” है।
इस इलाक़े में देश के शक्तिशाली उद्योग समूह अडानी की दखल है।यह दखल कैसी हैं इसे समझने के लिए यह जानना जरुरी है कि, यह ईलाका जिसे शासकीय अभिलेख हसदेव अरण्य कहा जाता है, वहाँ 2009 में खनन के लिए केंद्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय ने सर्वे के बाद “खनन के लिए NO GO” क्षेत्र घोषित किया। और ठीक दो साल बाद तब के केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस ईलाके में तीन कोल ब्लॉकों को सहमति दे दी।हालाँकि तब यह शर्त दर्ज की गई कि, इस तीन ब्लॉक तारा,परसा ईस्ट और केते बासेन को छोड़कर अन्य किसी खनन परियोजना को स्वीकृति नहीं दी जाएगी।खबरें कहतीं हैं कि, एनजीटी याने नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने याचिका पर फ़ैसला देते हुए परसा ईस्ट और केते बासेन की स्वीकृति को रद्द कर दिया।
इस इलाक़े में मोरगा 2 के नाम से नया प्रोजेक्ट जब स्वीकृति के लिए भेजा गया तो केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने दो टूक जवाब दिया
“मुख्य हसदेव अरण्य में अब किसी भी कोल ब्लॉक को पर्यावरणीय अनुमति नहीं दी सकती”
आरोप है कि, मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने पर्यावरण के नो ज़ोन को दरकिनार कर दिया और एक क़तार में कोल ब्लॉक को स्वीकृति दे दी।

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विवाद नए ब्लॉकों को लेकर तो है ही, मसला पुराने ब्लॉक्स को लेकर भी है। इस इलाक़े में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला बताते हैं –
“सरगुजा और सूरजपुर ज़िले संविधान की पाँचवी अनूसुची में शामिल हैं,यहाँ पेसा एक्ट लागू है, किसी भी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के पहले ग्राम सभा की अनुमति लिखित सहमति जरुरी है, लेकिन प्रस्तावित परसा कोल ब्लॉक के लिए ज़मीन अधिग्रहण की कार्यवाही ग्राम सभा की स्वीकृति नहीं ली गई”
धरने पर बैठे ग्रामीणों का समुह यह सवाल उठाता है –
“हसदेव अरण्य की बीस ग्रामसभाओं ने 2015 में सर्वसम्मति से कोल ब्लॉक के आबंटन का विरोध किया, यह प्रस्ताव पीएम और तत्कालीन मुख्यमंत्री को सौंपे गए थे। हमारे विरोध को दरकिनार कर के पाँच कोल ब्लॉक और आबंटित किए गए हैं, जो संविधान की पांचवी अनुसूची और पेसा एक्ट की खुली अवहेलना है।पतुरिया गिदमुडी और मदनपुर में हर कार्यवाही पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए।”
विदित हो कि, पतुरिया गिद्धमुडी कोल ब्लॉक का आबंटन छत्तीसगढ पॉवर जनरेशन कंपनी को हुआ है, जिसका अदानी समुह के साथ MDO है, MDO याने माइंस डेवलपर कम ऑपरेटर याने अदानी खदान तैयार कर करेगा और उसे ऑपरेट भी करेगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अंबस्ट की बात यह समझाती है कि,राज्य की क्या भुमिका होती है, संजय कहते हैं –
“कोल ब्लॉक आबंटन नीलामी यह केंद्र का विषय है, लेकिन संघीय ढाँचे में राज्य बेबस नहीं है बल्कि शक्तिशाली है, क्योंकि वन पर्यावरण की स्वीकृति की प्रक्रिया, भुमि अधिग्रहण की कार्यवाही राज्य सरकार करती है, और इस प्रक्रिया में सबसे अहम यह है कि राज्य सरकार यह देखती है कि,यदि स्वीकृति दी जाती है तो वन संपदा,जल स्त्रोत,जीव जंतु, पर्यावरण, आजीविका, रहवास, और संस्कृति पर प्रभाव क्या होगा,और इन सबसे संबंधित अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करना राज्य सरकार का काम है”
हसदेव अरण्य ईलाके की जैव विविधता केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व में नायाब है, यह हसदेव नदी और बांगो बांध का कैचमेंट हैं जिससे चार लाख हेक्टेयर ईलाके में सिंचाई होती है,वन्य प्राणियों का रहवास तो खैर है ही।
तब जबकि राहुल गांधी आए थे, उन्होंने ग्रामीणों की लड़ाई को जायज़ बताया और अनुबंधों को सार्वजनिक करने की माँग रखी जो कि MDO में दर्ज हैं।

तब इस MDO को सार्वजनिक करने से मना किया गया था, आज जबकि कांग्रेस की सरकार है तो भी MDO के अनुबंध की शर्तें सार्वजनिक नही है, राज्य सूचना आयोग ने अनुबंध की कॉपी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए तो उर्जा विभाग ने रिव्यू पिटीशन दाखिल कर दिया, हालाँकि राज्य सूचना आयोग ने इस रिव्यू को ख़ारिज कर दिया। खबरें हैं कि अब मौजुदा कांग्रेस सरकार इस अनुबंध को दिए जाने के आदेश के ख़िलाफ़ कोर्ट जाने की तैयारी में है।
इधर ग्रामीणों ने दीवाली के दिए घरों पर नहीं जलाए और आंदोलन स्थल पर सत्याग्रह के प्रणेता महात्मा गांधी की तस्वीर के चारों ओर जलाए। पाँच दिए अपने पुरखों और देवताओं के नाम जलाए। ग्रामीणों का समूह वह प्रसिद्ध चिर परिचित गीत और नृत्य रोज करता है जिसे करमा कहते हैं ..
करमा जो प्रकृति और वनवासी के रिश्ते को बताता है, जो प्रकृति को धन्यवाद देता है और यह संकल्प भी जतलाता है
“हम अपना जंगल अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे”

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