CS के दावेदारों की आज की रात होगी लंबी, सेम बैच के दो दावेदारों के कारण नए चीफ सिकरेट्री की पोस्टिंग पर लोगों की टिकी निगाहें

रायपुर, 30 अक्टूबर 2019। नए चीफ सिकरेट्री की पोस्टिंग की अब उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अब से कुछ घंटे बाद सीएस सुनील कुजूर रिटायर हो जाएंगे। और उनकी जगह ब्यूरोक्रेसी के नए मुखिया के नाम का ऐलान हो जाएगा।

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चूकि अब कुछ घंटे शेष रह गए हैं। कह सकते हैं, सिर्फ एक रात। सुबह होने के बाद पूजा-पाठ करके आफिस जाने के बाद अफसरों के दिन यूं ही निकल जाएंगे। जाहिर है, दावेदारों की आज की रात बेहद लंबी होगी। जो मेन मुकाबले में हैं, उनकी भी और जो एक्सट्रा प्लेयर हैं उनकी भी। मेन मुकाबले में 87 बैच के सीएस खेतान और आरपी मंडल हैं। तो अजय सिंह और एन बैजेंद्र कुमार का नाम भी गाहे-बगाहे आ जा रहा है।

रात लंबी होगी इसलिए, क्योंकि हर आईएएस का सपना होता है एक बार सीएस बनना। जैसे आईपीएस की डीजीपी और आईएफएस का पीसीसीएफ बनना। सीएस तो इन तीनों में सबसे उपर और प्रभावशाली पद होता है। पावर में अगर सीएम के बाद एक तरह से कहें तो दूसरे नम्बर पर सीएस का पद आता है। हालांकि, प्रोटोकॉल में जरूर सीएस का रैंक मंत्रियों से नीचे है। लेकिन, पावर में उपर। सीएस कैबिनेट का सिकरेट्री होता है। कौन सा इश्यू कैबिनेट में रखना है, इसे भी तय करना सीएस का काम होता है। सरकार की सारी योजनाओं के क्रियान्वयन की मानिटरिंग सीएस के हाथ में होती है। मंत्रालय के सिकरेट्रीज से लेकर कलेक्टरों तक सीधे सीएस के नियंत्रण में होते हैं। यद्यपि, छोटे राज्य होने के कारण अब कलेक्टर, एसपी सरकार से नदीकियां बढ़ाने में कामयाब हो जाते हैं। फिर भी सिकरेट्री और कलेक्टर सीएस को इगनोर नहीं कर सकते। दरअसल, सीएस जीएडी का चीफ होता है। सीआर से लेकर तमाम तरह की फाइलें सीएस के पास ही जाती है।
पुराने नौकरशाह भी स्वीकार कर रहे हैं कि सीएस की नियुक्ति को लेकर इससे पहले इतना रोमांच कभी नहीं रहा। 19 साल में 10 सीएस बनें। अरुण कुमार छत्तीसगढ़ के प्रथम सीएस थे। उस समय मध्यप्रदेश से कोई आना नहीं चाहता था। इसलिए, अरुण कुमार की किसी की परवाह नहीं थी। उनके बाद सीनियरिटी में एसके मिश्रा थे। इसलिए, जोगी सरकार ने उनके नाम पर मुहर लगा दिया। शिवराज सिंह के समय जरूर कुछ उत्सुकता थी। लेकिन, तब वो एक बैच वाला मामला नहीं था। सोशल मीडिया का दौर नहीं था। तभी तीन-तीन सीनियर अफसरों को सुपरशीट करके शिवराज को सीएस बना दिया गया। लेकिन, कोई खबर नहीं बन सकी। क्योंकि, वह अगले दिन अखबारों में छपी। और, एक दिन में उसकी अहमियत खतम हो गई। पीजाय उम्मेन का तख्ता पलट हुआ, तब लोगों को पहले से अहसास हो गया था कि सरकार उन्हें हटा सकती है। एक तो उनका लंबा समय भी हो गया था। इसलिए, वो खबर भी एक दिन में खतम हो गई।

कई सीनियर नौकरशाह भी मानते हैं कि चीफ सिकरेट्री बनना पूरी तरह भाग्य का खेल होता है। जोड़-तोड़ और पारफारमेंस कोई आधार नहीं होता। अब तक तो ऐसा देखने में नहीं आया। अगर काम ही आधार होता तो अशोक विजयवर्गीय, पीजाय उम्मेन समेत कई आईएएस चीफ सिकरेट्री नहीं बन पाए होते। और, एमके राउत जैसे रिजल्ट देने वाले आईएएस इससे वंचित नहीं होते। बीकेएस रे दो बार सुपरशीट हुए। शिवराज सिंह के समय और उम्मेन के समय भी। जाहिर है, बीकेएस रे उम्मेन से तो काबिल थे। रही बात सुनिल कुमार की। सुनिल कुमार भारत सरकार में ही सिकरेट्री बनना चाहते थे। वहां वे एडिशनल सिकरेट्री हो गए थे। उन्होंने यहां आने से इंकार भी किया था। लेकिन, बताते हैं, तत्कालीन मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह ने उन्हें छत्तीसगढ़ भवन बुलाकर बात की। इसके बाद वे छत्तीसगढ़ लौटे। कहने का आशय यह है कि चीफ सिकरेट्री उनका बनना उनके मुकद्दर में था। इससे एक बात स्थापित होती है, जिसके माथे पर लिखा होता, सीएस वही बनेगा।

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