सारकेगुड़ा प्रकरण: …आसान नहीं थी यह लड़ाई NPG से बोलीं अधिवक्ता शालिनी गेरा – “ न्यायिक जाँच रिपोर्ट स्पष्ट.. सरकार को अब FIR करनी चाहिए….ग्रामीणों की लड़ाई लड़ने पर हमें शहरी नक्सली तक कहा गया

रायपुर,1 दिसंबर 2019। सारकेगुड़ा की न्यायिक लड़ाई आसान नहीं थी, यह वो लड़ाई थी जिसे लड़ने में सात बरस लग गए। इस लड़ाई को लड़ने वालों को शहरी नक्सली तक कहा गया। सारकेगुड़ा की लड़ाई की पहली शुरुआत के लिए ग्रामीणों की ओर से जिस शपथ पत्र और अभिलेखों की जरुरत थी वह उन ग्रामीणों तक पहुँच कर सुधा भारद्वाज लाईं थीं।मानवाधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुधा भारद्वाज इस समय भीमा कोरेगाँव हिंसा में अभियुक्त बताते हुए पुणे पुलिस द्वारा गिरफ़्तार रखी गई हैं।
इस प्रकरण की लड़ाई प्रख्यात वकील युगमोहित चौधरी ने लड़ी वे निःशुल्क इस प्रकरण में ग्रामीणों का पक्ष रखने मुंबई से अपने खर्चे पर आते रहे थे।
प्रकरण में ग्रामीणों के पक्ष से मौजुद रहने वाली अधिवक्ता शालिनी गेरा ने NPG से कहा

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“ हाँ, यह लड़ाई कठिन थी, लेकिन वे 32 ग्रामीण जो डटे रहे जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी..और बहुत से लोग जिनमें वकील पत्रकार शामिल थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे, उन सब की मेहनत शामिल है”

शालिनी ने कहा

“ मुझे याद है, इस प्रकरण में विरोधी पक्ष घटना पर बहस कम करता था.. हमें शहरी नक्सली बताने की क़वायद ज़्यादा करता था.. सवाल होते थे कि ये दिल्ली मुंबई वाले लोग हैं.. इन्हें पैसा कौन देता है.. हवाई जहाज़ की टिकटें कौन मुहैया कराता है”

हालाँकि न्यायिक जाँच की रिपोर्ट से शालिनी गेरा संतुष्ट हैं, वे मानती हैं कि आयोग ने समय
लिया लेकिन रिपोर्ट तथ्यात्मक है। शालिनी गेरा ने कहा

“ मैं यह नहीं समझ पाई कि आख़िर एक महिने तक रिपोर्ट रखी क्यों रहा..यह मुद्दा तो राज्य कांग्रेस ने ही उठाया था.. यह नंद कुमार पटेल जी और कवासी लखमा जी की मेहनत थी जो न्यायिक जाँच आयोग गठित करना पड़ गया.. अब सरकार को चाहिए कि वो दोषियों पर FIR करे”

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