क्रमोन्नति के अभ्यावेदन जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से होने लगे निरस्त…. टूटने लगी शिक्षकों की उम्मीदे

रायपुर 9 अक्टूबर 2019। आखिरकार वही हो रहा है जिसका डर था, न्यायालय से मिले आदेश के आधार पर सौपे गए अभ्यावेदन भी अब जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से निरस्त होने लगे हैं। प्रदेश में शिक्षकों ने भारी तादाद में क्रमोन्नति के लिए याचिकाएं दायर की लेकिन इसमें सबसे बड़ी खामी यह थी कि क्रमोन्नति के लिए जो सबसे पहला आदेश पारित हुआ था उसी में इस बात का स्पष्ट जिक्र था कि याचिकाकर्ता अपना अभ्यावेदन प्रशासन को सौंपे और प्रशासन इसके बाद नियमानुसार निर्णय ले लेकिन इसे कुछ लोगों ने निज हित में इस प्रकार प्रचारित प्रसारित किया मानो क्रमोन्नति को लेकर स्पष्ट आदेश जारी हो गया हो इसके बाद तो मानो भीड़ ही लग गई और शिक्षाकर्मियों ने हजारों की संख्या में याचिकाएं लगाकर उसी आदेश को प्राप्त कर लिया।

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इधर कई जगहों पर अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए पहले क्रमोन्नति के आदेश जारी भी कर दिए और बाद में फटकार पड़ने पर वापस भी ले लिया । हालांकि कुछ संगठनों और नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए इन आदेशों को अपने ज्ञापन और अभियान की जीत बताया लेकिन कुछ ही घंटों के अंदर वह आदेश निरस्त भी हो गए जिस पर संगठनों ने चुप्पी साध ली । अब उन शिक्षकों को भी झटका लगने लगा है जो हजारों रुपए खर्च करके न्यायालय से आदेश लेकर उम्मीद लगाए बैठे थे दरअसल क्रमोन्नति के मामले में पहले से ही यह बात स्पष्ट है कि क्रमोन्नति के समस्त प्रकार के देयकों की भुगतान की जिम्मेदारी पंचायत विभाग की है ऐसे में स्कूल शिक्षा विभाग ने इससे सीधे तौर पर पलड़ा झाड़ लिया है और संविलियन के लिए शिक्षकों से इस बात की सहमति भी ले ली गई थी की जिस तारीख से स्कूल शिक्षा विभाग में उनका संविलियन हुआ है उसी तारीख से वह स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी माने जाएंगे और उनकी सेवा की गिनती उसी तारीख से स्कूल शिक्षा विभाग में होगी ।

इधर पंचायत विभाग ने 2011 में दिए गए क्रमोन्नति आदेश को 2013 में भूतलक्षी प्रभाव से निरस्त कर दिया था ऐसे में जनपद पंचायतों ने जब आदेश निकाला तो राज्य कार्यालय से उनको अच्छी तरीके से यह याद दिला दिया गया कि 2013 में क्रमोन्नति का आदेश राज्य सरकार ने वापस ले लिया था खासतौर पर दंतेवाड़ा जिले में अधिकारी द्वारा जारी किए गए आदेश को लेकर यह स्थिति निर्मित हुई थी जिसके बाद उन्होंने आनन-फानन में अपने आदेश को वापस ले लिया था । अब दुर्ग जिला के जिला शिक्षा अधिकारी हेमंत उपाध्याय ने भी स्पष्ट जारी आदेश जारी करते हुए याचिकाकर्ता हेमा यादव के मामले में इसी बात को सामने रखा है कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति स्कूल शिक्षा विभाग में 1 जुलाई 2018 से संविलियन उपरांत हुई है अतः पूर्व के किसी भी राशि की जिम्मेदारी विभाग की नहीं है और इसलिए क्रमोन्नत वेतनमान के भुगतान को शिक्षा विभाग द्वारा संभव नही है ।

क्रमोन्नति के नाम पर जमकर हुई राजनीति लेकिन नहीं मिल पाया जमीनी लाभ 

प्रदेश में शिक्षक नेताओं ने जितनी राजनीति क्रमोन्नति के नाम पर की है उतनी राजनीति किसी विषय पर नहीं हुई है । एक संघ द्वारा तो बकायदा चंदा वसूल कर क्रमोन्नति फॉर्म भरवाया गया और लगभग 80000 फॉर्म जमा करने की बात भी प्रचारित किया गया उसके बाद न तो उस फॉर्म के विषय में कभी कोई जानकारी शिक्षकों को लगी और न ही उस चंदे की राशि की । अब शिक्षक ही उन पर चंदे की राशि हड़पने का आरोप लगा रहे हैं क्योंकि एक एक शिक्षक से 100-100 रुपए वसूली की गई थी इस लिहाज से केवल क्रमोन्नति के नाम पर 80 लाख रुपए का खेल हो गया था ।

मध्यप्रदेश में शिक्षक नेताओं की दूरदर्शिता ने दिलाई बड़ी जीत

एक बार फिर क्रमोन्नति के नाम पर इस साल फॉर्म भरवाया गया और उसका भी वही हश्र हुआ जो इससे पहले वाले क्रमोन्नति अभियान का हुआ था अंतर बस इतना था कि पिछले बार क्रमोन्नति फॉर्म जमा करने वाले शिक्षकों ने ही इस बार क्रमोन्नति फॉर्म भराए जाने का विरोध कर दिया । ऐसा नहीं है कि केवल एक संघ ने क्रमोन्नति के नाम पर राजनीति की है अन्य संघों के लिए भी क्रमोन्नति एक बड़ा विषय रहा है और उसे लेकर शिक्षकों को अपने पाले में करने का खेल चलता रहा है पर 2013 से निरस्त हुए क्रमोन्नति पर आज तक किसी भी संगठन को कोई सफलता हासिल नहीं हुई है यह विषय इसलिए गंभीर है क्योंकि क्रमोन्नति शासन द्वारा 2011 में शिक्षकों को दी गई थी और फिर 2013 में उसे निरस्त किया गया साथ ही मध्यप्रदेश में वहां के शिक्षकों को न केवल क्रमोन्नति दिया गया है बल्कि उनकी पुरानी सेवा अवधि की गणना भी हुई है इस लिहाज से मध्य प्रदेश के शिक्षक छत्तीसगढ़ के शिक्षकों से काफी आगे निकल चुके हैं जिससे साफ पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में विषयों को लेकर राजनीति ज्यादा और लड़ाई कम हुए हैं इसीलिए जिन विषयों पर निश्चित जीत मिलनी चाहिए थी वह विषय भी अब हाथ से निकलते हुए दिखाई दे रहे हैं।

हालांकि शिक्षक नेता इसे अभी भी मिलना तय बता रहे हैं पर आम शिक्षकों को भी अब यह एहसास होने लगा है कि वास्तव में उनकी यह मांग राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है और स्कूल शिक्षा विभाग में आने के बाद तो यह और भी अधिक दूर की कौड़ी दिखाई देने लगी है ।

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