जानें कौन हैं रामलला विराजमान, जिन्हें SC ने माना है विवादित जमीन का असल मालिक…..ये रिपोर्ट आपकी पूरी जानकारी कर देगी साफ

नयी दिल्ली 9 नवंबर 2019। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आ चुका है. अयोध्या में यह विवाद दशकों से चला आ रहा था. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन रामलला को सौंप दी है. जबकि मुस्लिम पक्ष को अलग स्थान पर जगह देने के लिए कहा गया है.

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कौन हैं रामलला विराजमान

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन का मालिक रामलला को माना है। आपको बता दें कि ये रामलला ना तो कोई संस्था है और ना ही कोई ट्रस्ट, यहां बात स्वयं भगवान राम के बाल स्वरुप की हो रही है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को लीगल इन्टिटी मानते हुए जमीन का मालिकाना हक उनको दिया है।गौरतलब है कि 22/23 दिसंबर 1949 की रात मस्जिद के भीतरी हिस्से में रामलला की मूर्तियां रखी गईं थी. रामलला विराजमान को प्रतिनिधित्‍व त्रिलोकनाथ पांडे करते हैं और पांडे विश्‍व हिंदू परिषद (वीएचपी) के सदस्‍य हैं। देवकी नंदन अग्रवाल जो कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर जज हैं, वह पहले ‘अगले मित्र’ थे।अग्रवाल की तरफ से साल 1989 में केस दायर किया गया था जिसमें रामलला विराजमान और श्रीराम जन्‍मभूमि का प्रतिनिधित्‍व करने का दावा किया गया था। पांडे जो कि वीएचपी के सीनियर लीडर हैं वह साल 2002 में अग्रवाल की मृत्‍यु के बाद अगले मित्र बन गए थे।

23 दिसंबर 1949 की सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्तियां प्रकट हुई थीं, जो कई दशकों या सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थीं और जिनके लिए वहीं की सीता रसोई या कौशल्या रसोई में भोग बनता था. राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा के नियंत्रण में थे और उसी अखाड़े के साधु-संन्यासी वहां पूजा-पाठ आदि विधान करते थे. 23 दिसंबर को पुलिस ने मस्जिद में मूर्तियां रखने का मुकदमा दर्ज किया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क कर उस पर ताला लगा दिया गया था. कोर्ट ने तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम को इमारत का रिसीवर नियुक्त किया था और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की जिम्मेदारी दे दी थी.

नरसिम्हा राव की किताब में है पूरी घटना का जिक्र

पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपनी किताब ‘अयोध्याः 6 दिसंबर 1992’ में उस एफआईआर का ब्यौरा दिया है, जो 23 दिसंबर 1949 की सुबह लिखी गई थी. एस.एच.ओ. रामदेव दुबे ने भारतीय दंड संहिता की धारा 147/448/295 के तहत एफआईआर दर्ज की थी. उसमें घटना का जिक्र करते हुए लिखा गया था, “रात में 50-60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुस गए और वहां उन्होंने श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की. उन्होंने दीवार पर अंदर और बाहर गेरू और पीले रंग से ‘सीताराम’ आदि भी लिखा. उस समय ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल ने उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी. वहां तैनात पीएसी को भी बुलाया गया, लेकिन उस समय तक वे मंदिर में प्रवेश कर चुके थे.”

 

 

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