फ़ायर ब्रांड युद्धवीर का मौन .. लेकिन NPG से बोले “वक्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमाँ.. हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है”

रायपुर,3 दिसंबर 2019।फ़ायर ब्रांड,जशपुर कुमार दिलीप सिंह के पुत्र युद्धवीर सिंह जूदेव मौन पर हैं। उनके समर्थक बताते हैं कि, युद्धवीर हालिया संगठन चुनाव के दौरान उन्हें तवज्जो और पद मिलने से सख़्त नाराज़ हैं जिन पर जूदेव समर्थकों का आरोप है कि उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा। हालाँकि युद्धवीर ने सीधे तौर पर कुछ भी नहीं कहा है। लेकिन पुष्ट संकेत है कि समर्थकों के साथ लगातार बैठकों का दौर जारी है।इन बैठकों का नतीजा क्या निकलता है यह भविष्य के गर्भ में है।
युद्धवीर सिंह जूदेव जशपुर कुमार दिलीप सिंह जूदेव के सबसे छोटे पुत्र है। जो जशपुर और जूदेव परिवार को जानते हैं,उन्हें युद्धवीर का औरा बताने की जरुरत नहीं, लेकिन जिन्हें नहीं पता उसके लिए यह जानना जरुरी होगा कि, दिलीप सिंह जूदेव के नक़्शे कदम पर जो सबसे करीबी अंदाज में चला, बल्कि फ़ायर ब्रांड सियासत को जिसने चरितार्थ कर दिया वो युद्धवीर ही है। “ना खाता ना बही.. जो छोटू कहे सो सही” जशपुर इन पंक्तियों को जानता है। छोटू बाबा युद्धवीर का उपनाम है और उनके समर्थक उन्हें इस नाम से बुलाते रहे हैं।युद्धवीर चंद्रपुर से दो बार के विधायक रहे हैं, और इस चुनाव में पार्टी ने युद्धवीर की जगह उनकी पत्नी संयोगिता सिंह जूदेव को टिकट दिया था, नतीजे हार के रुप में आए थे।
संगठन से अनबन के मसले पहले भी आते रहे हैं लेकिन जशपुर कुमार दिलीप सिंह जूदेव का सियासती अनुभव किसी गहरी नदी का था जिसके भीतर कितनी तेज लहर चल रही है इसका अंदाज उपर से नहीं लगता था। जोगी शासनकाल के अवसान के पीछे सबसे बड़ा कारण जिस शख़्स की दृढ़ता को माना गया वह उत्तर छत्तीसगढ़ में बिलाशक जूदेव ही थे। यह बात की पुष्टि नही होती लेकिन चर्चाएँ होती हैं कि भाजपा के बहुमत आने के बाद जूदेव का क़ाफ़िला रायपुर के लिए रवाना हुआ, यह क़रीब क़रीब तय माना जा रहा था कि, जशपुर का वैभव विलास पैलेस मुख्यमंत्री का पैतृक आवास के रुप में जाना जाएगा, लेकिन रास्ते में जबकि कुमार साहब और उनका क़ाफ़िला एक ढाबे पर था, तरोताज़ा हो रहा था, जशपुर कुमार का फ़ोन बजा, फ़ोन दिल्ली से था.. वहाँ से जो भी कहा गया, कुमार दिलीप सिंह जूदेव वापस जशपुर लौट गए।और कुछ ही घंटे बाद जशपुर समेत छत्तीसगढ़ को पता चला कि सीएम के रुप में शपथ डॉ रमन सिंह ले रहे हैं। यह जूदेव थे जिन्होंने मौन साध लिया लेकिन उस मौन में इतना वजन था कि सियासत की स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा जो उनके अपने दल में भी थी वह भी उनके औरे के ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। भाजपा के नए शक्ति स्तंभों में क़वायद की, बल्कि भरपूर कवायद हुई कि, जशपुर में जूदेव का विकल्प मिल जाए लेकिन यह क़वायद सफल नहीं हो पाई। राजा रणविजय सिंह जूदेव की भाजपा में मौजुदगी इन्हीं क़वायदों में से एक गिनी जाती है।
कुमार साहब के रहते रहते जिस की सीधी दखल सियासत में हुई, वह युद्धवीर ही था। जिस फ़ायर ब्रांड अंदाज मिज़ाज के साथ जशपुर में छोटू ने सियासत की, उसने युवा समर्थकों की भीड़ खड़ी कर ली। युद्धवीर के तेवर ऐसे थे कि, विरोधी चाहे दल के हों या विरोधी दल के, कोई सामने आने की हिमाक़त नहीं कर पाया। बिलासपुर लोकसभा चुनाव में कुमार साहब की जीत हुई लेकिन कई बार वे खुद कहते थे-

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“ जिनके मूँछ की रेंक भी नही उगी.. यह चुनाव उन्होंने लड़ा .. जान जानी जनार्दन दे दनादन .. यह गीत वे युवा नही चरितार्थ करते तो …”
यह माना गया कि, दिलीप सिंह जूदेव की यह पंक्तियाँ युद्धवीर और सुशांत शुक्ला के लिए कही गईं।

युद्धवीर को विधानसभा चंद्रपुर के ज़रिए भेजा गया। जशपुर में भाजपा के भीतरखाने हलचल तब तब मचती जब जब युद्धवीर जशपुर पहुँचते। और एक वक्त ऐसा आया जबकि युद्धवीर ने जशपुर की सियासत में सीधे हस्तक्षेप से किनारा कर लिया। हालाँकि यह अंतिम तौर पर तब हुआ जबकि खुद कुमार दिलीप सिंह जूदेव ने चंद्रपुर में ध्यान देने के निर्देश दिए। कुमार साहब के गुजरने के बाद स्थितियाँ जटिल हुई। युद्धवीर चंद्रपुर में ही मौजुद रहे और दूसरा चुनाव भी जीत गए।
लेकिन जैसा कि होना था, भाजपा का गढ़ रहा जशपुर दरकने लगा था। जशपुर में सत्ता में विकल्प के रुप में जिन चेहरों को आगे किया वे वह जादू तो छोड़िए लहर तक नहीं जगा पाए जो कि कुमार दिलीप सिंह जूदेव के जाने के बाद की रिक्तता आई, वह शून्यता को भरना तो दूर थोड़ा पास तक पहुँच पाने में भी कोई सफल नहीं हुआ। नतीजा विधानसभा चुनाव में नज़र आया जबकि तीनों सीटो पर भाजपा खेत रही। यही वह चुनाव भी था जबकि युद्धवीर का टिकट काटा गया और उनकी जगह संयोगिता को टिकट मिली, लेकिन वे भी हार गईं।
युद्धवीर ने इस हार पर केवल इतना कहा

“जनादेश सर आँखों पर.. मैं और सेवा करुंगा.. मैं चंद्रपुर से हिलूँगा तक नहीं..मैं हर पहर सेवा के लिए मौजूद रहूंगा”
लेकिन युद्धवीर के समर्थकों ने इसे भीतरघात करार दिया और समीक्षकों की राय में यह जीत का प्रति आत्मविश्वास भी था जिसने भीतरघातियों की पहचान मौक़े पर नहीं होने दी। एक राय यह भी आती है कि, इस विधानसभा में 2003 का वह अंदाज दोहराया गया जिसके तहत कांग्रेस ने अपनी सीटें हारी नहीं बल्कि हरवाई गईं।

लेकिन इन किसी भी राय पर युद्धवीर मौन ही रहे। लेकिन हालिया संगठन चुनाव ने और युद्धवीर के स्वाभाविक रुप से परम प्रिय क्षेत्र जशपुर के हालात ने लगता है कि ग़ुस्सा भड़का दिया है। जूदेव समर्थक राजेश कहते है

“संघर्ष का दौर है ये.. इसमें गुटबाज़ी का मतलब नहीं है..2000 से 2003 तक का दौर याद करिए.. संभागवार नेताओं ने मामला सम्हाला था.. एक दूसरे के क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं..लेकिन अभी ऐसा नहीं है..बल्कि चाहे जशपुर चाहे चंद्रपुर कमजोर करने की ही कोशिश हुई..”
जूदेव के अन्य समर्थक सुशील कहते हैं

“पहले एक कप्तान होता था सही भी था.. हार हो या जीत हो.. गाली भी कप्तान को.. ताली भी कप्तान को.. लेकिन अभी ऐसा नहीं है..”
क्या स्थितियाँ ऐसी हैं कि युद्धवीर पार्टी छोड़ दें.. क्या युद्धवीर ऐसा कुछ कर रहे हैं तो NPG को इसका जवाब मुस्कुराते हुए युद्धवीर ने कुछ यूँ दिया

“वक्त आने पे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ.. हम अभी से क्या बताएँ.. क्या हमारे दिल में है”

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