नहाय खाय से शुरू हुआ आज से छठ महापर्व….पूजा के इन नियमों, विधि, मुहूर्त, कथा को विस्तार से जानें… पढ़े पूरी खबर

रायपुर 31 अक्टूबर 2019। छठ पूजा को बहुत पवित्र त्योहारों में से एक माना जाता हैं इसे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह पूजा नहाए खाए के साथ शुरू होती है और पूरे 4 दिनों तक चलती है। छठ पूजा को लेकर राजधानी में सबसे बड़ा आयोजन महादेवघाट में होता है। यहां एक साथ 20 हजार से ज्यादा श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देंगे। आयोजन समिति ने इसके लिए सारी तैयारियां कर ली हैं। यहां पर पार्किंग, टेंट, महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम भी तैयार हैं। मुख्य कार्यक्रम 2 नवंबर को होगा। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए लोग महादेवघाट में जुटेंगे। इस दिन दोपहर 3 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हाे जाएंगे। महादेव घाट के अलवा बिरगांव, कालीबाड़ी तालाब, सहित कई जगहों पर श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देंगे।

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धर्म शास्त्रों में सुबह के समय स्नान को चार उपनाम दिए गए हैं,
मुनि स्नान जो सुबह 4 से 5 के बीच किया जाता है। इस समय स्नान करने से घर में सुख,शांति,समृद्धि,विद्या,बल,आरोग्य,चेतना आती है। देव स्नान जो सुबह 5 से 6 के बीच किया जाता है। जिससे आपके जीवन में यश,कीर्ति,धन,वैभव,सुख,शान्ति,संतोष आता है। मानव स्नान जो सुबह 6 से 8 के बीच किया जाता है।  इसको करने से काम में सफलता,भाग्य,अच्छे कर्मों की सूझ,परिवार में एकता आदि रहती है। राक्षसी स्नान जो सुबह 8 के बाद किया जाता है वह दरिद्रता,हानि,कलेश,धन हानि,परेशानी आदि प्रदान करता है । शास्त्रों के अनुसार मुनि स्नान सर्वोत्तम है, देव स्नान उत्तम है, मानव स्नान सामान्य है और राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है इसलिए किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। छठ के समय खासकर जो घर की स्त्रियां होती थी चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, बहन के रूप में हो उनको सूरज के निकलने से पहले ही स्नान कर लेना चाहिए। ऐसा करने से धन और वैभव लक्ष्मी सदैव आपके घर में वास करती है।

छठ पूजा पर्व ऐसे चलेगा चार दिन तक-
31 अक्टूबर को नहाय खाय – आज के लिए लोग घरों की सफाई करके शुद्ध और पवित्र महौल में प्रवेश करेंगे।

1 नवंबर को खरना – इन दिन व्रती दिन में एक बार खाना खाना होता है। इसके लिए कद्दू या सीताफल की सब्जी और पूरी व खीर ही खाई जाती है। खरना में जो प्रसाद तैयार किया जाता है उसके लिए नया चूल्हा या साफ सुथरी रसोई का ही इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग आम की लकड़ी से ही खाना पकाते हैं। खरना के दिन से ही व्रत शुरू होना माना जाता है।

2 नवंबर को सायंकालीन सूर्य को अर्घ्य – दो नवंबर को पूरा दिन व्रत रखने के बाद व्रती शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और रात भर जागकर सूर्य देवता के जल्दी उदय होने की कामना करते हैं। व्रती को सूर्योदय तक पानी तक नहीं पीना होता। इसीलिए इस व्रत को काफी कठिन व्रत माना जाता है।

3 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य – व्रत के आखिरी दिन 3 नवंबर को जब उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देने के बाद ही व्रती पारण करता है और प्रसाद ग्रहण करता है। इस अवसर पर छठी मइया यानी भगवान सूर्य से आशीर्वाद के लिए बहुत से लोग सपरिवार व्रत रखते हैं।

छठ पूजा सामग्री की सूची 

  • प्रसाद रखने के लिए बांस की दो तीन बड़ी टोकरी।
  • बांस या पीतल के बने तीन सूप, लोटा, थाली, दूध और जल के लिए ग्लास।
  • नए वस्त्र साड़ी-कुर्ता पजामा/धोती और अंगरखा।
  • चावल, लाल सिंदूर, धूप और बड़ा दीपक।
  • पानी वाला नारियल, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो।
  • सुथनी और शकरकंदी।
  • हल्दी और अदरक का पौधा हरा हो तो अच्छा।
  • नाशपाती और बड़ा वाला मीठा नींबू, जिसे टाब भी कहते हैं।
  • शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी।
  • कैराव, कपूर, कुमकुम, चन्दन, मिठाई।
  • इसके साथ ही ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू, जिसे लडु़आ भी कहते हैं आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाएगा।

पूजा विधि :  

टोकरी को धोकर उसमें ठेकुआ के अलावा नई फल सब्जियां भी रखी जाती हैं। जैसे कि केला, अनानास, सेबर्, सिंघाडा, मूली, अदरक पत्ते समेत, गन्ना, कच्ची हल्दी, नारियल आदि रखते हैं। सूर्य को अघ्र्य देते वक्त सारा प्रसाद सूप में रखते हैं। सूप में ही दीपक जलता है। लोटा से सूर्य को दूध, गंगाजल और साफ जल से फल प्रसाद के ऊपर चढ़ाते हुए अघ्र्य दिया जाता है। छठ में प्रसाद के रूप में बनने वाले ठेकुआ और चावल के लड्डू उसी चावल व गेहूं से बनेंगे, जो विशेष तौर से छठ के लिए धोए, सुखाए और पिसवाए जाते हैं। ध्यान रहे कि सुखाने के दौरान अनाज पर किसी का पैर न जाए। यहां तक कि कोई पक्षी भी चोंच न मार पाए, क्योंकि फिर उसे जूठा माना जाएगा और ऐसे गेहूं व चावल का इस्तेमाल वर्जित है।

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