दिल भी जीता और….

3 नवंबर 2019
छठ की छु्ट्टी को लेकर भले ही लोग अगर-मगर कर रहे हो, लेकिन इसके जरिये सीएम भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या में रह रहे उत्तर भारतीयों का न केवल दिल जीत लिया बल्कि नगरीय निकाय चुनाव के लिए पार्टी की स्थिति मजबूत कर दी। भूपेश जमीनी नेता हैं…काफी स्ट्रगल करके उपर आए हैं। उनके हर फैसलों के अपने मायने होते हैं। भिलाई से बिलांग करने की वजह से उन्हें अच्छे से पता है कि खासकर शहरी इलाकों में बिहार, यूपी के लोगों की क्या प्रभाव है। और, इसे कैश करने में उन्होंने देर नहीं लगाई। लोग नाक-भौं सिकोड़ते रहे, उन्होंने छुट्टी का ऐलान ही नहीं किया बल्कि, व्यस्ततम कार्यक्रमों में से समय एडजस्ट कर सूबे में सबसे आरगेनाइज ढंग से होने वाले बिलासपुर के छठस्थल पर जाकर छठ आरती में भी शामिल हो आए। छठ की छुट्टी बिहार और दिल्ली के अलावा कहीं नहीं होती। छत्तीसगढ़ छठ महापर्व का मान बढ़ाने वाला दूसरा स्टेट है। नगरीय चुनाव में लोग आखिर इसे याद तो रखेंगे ही।

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दिवाली गिफ्ट-1

भूपेश सरकार ने सुनील कुजूर के रिटायरमेंट के आखिरी दिन आरपी मंडल को चीफ सिकरेट्री अपाइंट कर दिया। 19 साल में यह पहला मौका था, जब सीएस को लेकर लोगों में इतनी उत्सुकता दिखी। आखिरी क्षण तक एक ही सवाल था, अगला सीएस कौन….? हालांकि, मंडल का पलड़ा भारी था, ये सबको पता था। लेकिन, सरकार जिस धुंआधार मोड में फैसले ले रही, उससे लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहे थे….आखिर कब क्या हो जाए। बहरहाल, शासन ने नए मुख्य सचिव का ऐलान भले ही दोपहर में किया मगर, जिन लोगों ने 31 अक्टूबर की सुबह मंडल को मंत्रालय के गेट पर कार से उतरते देखा, उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि कुछ देर बाद होना क्या है। दरअसल, ड्रेस को लेकर मंडल सामान्य रहते हैं। अफसरी लुक में तो उन्हें यदा-कदा ही देखा जाता है। 31 को जब वे कार से उतरे तो वेल ड्रेसअप थे। बताते हैं, सीएम ने सुबह रायपुर के कार्यक्रम में निकलने से पहले चीफ सिकरेट्री के नोटशीट पर दस्तखत कर दिए थे। दोपहर एक बजे के करीब वे जांजगीर के लिए रवाना हुए और इधर नए सीएस का ऐलान हो गया।

दिवाली गिफ्ट-2

सूबे के सबसे सीनियर आईएएस अफसर अजय सिंह को फिर से चीफ सिकरेट्री बनने की अटकलें परवान नहीं चढ़ सकी। लेकिन, उन्हें जो मिला, उसे कम भी नहीं आंका जा सकता। पहली बात तो राजस्व बोर्ड बिलासपुर से उनकी रायपुर वापसी हो गई। वो भी, राज्य योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन बनकर। इस पोस्टिंग का मतलब बहुतों को समझ में नहीं आया होगा। एक्स चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार इस पद पर रह चुके हैं। कैबिनेट मंत्री के समकक्ष इस पोस्ट पर आने का एक बड़ा मतलब यह भी है कि उन्हें अब पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। चार महीने बाद वे आईएएस से रिटायर होंगे तो जाहिर है, इस पोस्ट पर संविदा में कंटीन्यू कर जाएंगे। इस पोस्ट में कोई एज लिमिट भी नहीं है। एक टर्म, दो टर्म…, सरकार चाहेगी, तब तक वे इस पद पर बने रह सकते हैं। है न ये दिवाली गिफ्ट।

रिप्लेसमेंट का संयोग

नया राज्य बनने के बाद 25 नंवबर 2000 को शैलेंद्र सिंह की जगह सुनील कुजूर बिलासपुर का कलेक्टर बने थे। कुछ महीने बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने कुजूर को हटाकर आरपी मंडल को बिलासपुर का कलेक्टर बनाया था। रिप्लेसमेंट का यह संयोग चीफ सिकरेट्री में भी जारी रहा। इस साल मार्च के इसी कॉलम में स्तंभकार ने इस रिप्लेसमेंट की ओर इशारा किया था। और, ये सही निकला। मंडल एक बार फिर कुजूर को रिप्लेस किए।

कुजूर और केडीपी

निवर्तमान चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर और एडिशनल चीफ सिकरेट्री केडीपी राव में भले ही दो बैच का अंतर रहा। लेकिन, हैं दोनों गहरे दोस्त। दोनों एक ही दिन रिटायर भी हुए। केडीपी के लिए रिटायरमेंट अखरने वाला रहा होगा क्योंकि, उन्हें गुमनामी में मंत्रालय से बिदा होना पड़ा। दरअसल, नए चीफ सिकरेट्री को लेकर कुछ दिनों से खबरों का सेंसेक्स इतना हाई चल रहा था कि केडीपी की तरफ ज्यादतर मीडिया का ध्यान नहीं गया। बहरहाल, अब उत्सुकता इस बात की है कि दोनों को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिलेगी….और मिलेगी तो किसमें। फिलहाल, दो पोस्ट खाली है। एक सहकारी निर्वाचन आयुक्त। गणेशशंकर मिश्रा को कुछ दिन पहले इस पोस्ट से हटाया गया है। और, दूसरा है सूचना आयुक्त। एके सिंह के रिटायर होने के बाद से यह पद खाली है। केडीपी राव तो इन दोनों में से किसी में भी जा सकते हैं। लेकिन, सुनील कुजूर के लिए विकल्प सीमित हैं। चीफ सिकरेट्री से रिटायर हुए हैं, इसलिए सूचना आयुक्त पद उनके लिए छोटा हो जाएगा। फिर, सहकारी निर्वाचन भी एक्स सीएस के लायक नहीं हैं। गणेशशंकर मिश्रा प्रमुख सचिव से रिटायर हुए थे। याने प्रमुख सचिव या अधिक-से-अधिक एसीएस लायक यह पद है। एक चर्चा उनके रेरा में जाने की चल रही है। लेकिन, रेरा में कोई पद वैकेंट नहीं है। हो सकता है, उपर लेवल पर दूसरा गुणा-भाग चल रहा तो फिर नो कमेंट।

कमलप्रीत का कद

आईएएस के नए फेरबदल में सरकार ने डा0 कमलप्रीत सिंह को ट्रांसपोर्ट सिकरेट्री एवं ट्रांसपोर्ट कमिश्नर का जिम्मा भी सौंप दिया है। कमलप्रीत के पास पहले से फूड और जीएडी का आईएएस शाखा था। अब तीसरा, ट्रांसपोर्ट हो गया। कमलप्रीत बैलेंस एवं रिजल्ट देने वाले अफसर माने जाते हैं। कुछ महीने पहिले सरकार ने उनसे आबकारी विभाग लेकर फूड दे दिया था। यकीनन यह उन्हें अच्छा नहीं लगा होगा। मगर अब ट्रांसपोर्ट देकर सरकार ने उनका कद बढ़ा दिया है।

कल्लूरी को शिफ्थ

डा0 कमलप्रीत सिंह के ट्रांसपोर्ट सिकरेट्री एवं कमिश्नर बन जाने से एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर एसआरपी कल्लूरी को अब ट्रांसपोर्ट से शिफ्थ करना पड़ेगा। पहले मनोज पिंगुआ ट्रांसपोर्ट सिकरेट्री थे और कमिश्नर भी। पिंगुआ और कल्लूरी सेम बैच के आईएएस, आईपीएस हैं। दोनों का 94 बैच है। अब 2002 बैच के आईएएस कमलप्रीत इस विभाग के सिकरेट्री और कमिश्नर हो गए हैं। कल्लूरी और कमलप्रीत में आठ बैच का अंतर है। इस पोस्टिंग से जाहिर है, सरकार जल्द ही ट्रांसपोर्ट में फेरबदल करेगी।

मुझसे क्या भूल हुई…

2009 बैच के आईएएस समीर विश्नोई पिछली सरकार में दुखी थे, इसमें भी कोई अच्छा नहीं दिख रहा है। पिछली सरकार ने एक साल से भी कम में कोंडागांव कलेक्टर से हटाकर उन्हें निर्वाचन में भेज दिया था। दो साल से वे इलेक्शन में हैं। उनके बाद निर्वाचन में सुब्रत साहू और भारतीदासन आए। और, दोनों वहां से निकल गए। भारतीदासन सबसे किस्मती रहे। निर्वाचन में सबसे बाद में आए और सबसे पहिले निकल लिए। वो भी रायपुर कलेक्टर बनकर। अब तो सुब्रत साहू भी मंत्रालय लौट गए हैं। आईएएस में बच गए हैं अब सिर्फ समीर। चित्रकोट उपचुनाव के बाद वहां अब कोई काम तो बच नही गया है। सिर्फ यह गुनगुनाने के…मुझसे क्या भूल हुई….।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर का एक्सटेंशन नहीं मिलने में कौन शख्सियत आड़े आ गया?
2. मनोज पिंगुआ को होम सिकरेट्री बनाते-बनाते लास्ट मोमेंट में सुब्रत साहू का नाम कैसे फायनल हो गया?

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