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शिक्षाकर्मियों ने सोशल मीडिया के जरिए टीएस बाबा से लगाई गुहार…… तो मिला जवाब – आप की दुविधा है हमारे संज्ञान में ! सोशल मीडिया की क्रांति फिर दिखा रही है एक बार अपना गहरा असर

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रायपुर 11 जून 2019। शिक्षाकर्मियों को संविलियन की जो सौगात मिली थी उसमें सोशल मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका थी क्योंकि जिस प्रकार आधी रात को संदेहास्पद रूप से हड़ताल की वापसी हुई थी उसे लेकर आम शिक्षाकर्मियों में जबरदस्त नाराजगी थी लेकिन बाद में आम शिक्षाकर्मियों और नेतृत्व कर्ताओं ने मिलकर बिना हड़ताल किए सोशल मीडिया के जरिए ऐसा मोर्चा खोला की “संविलियन न कभी हुआ है न कभी होगा” जैसा कठोर बयान देने वाले पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह को भी खुद मंच से “शिक्षाकर्मियों का संविलियन किया जाता है” का ऐलान करना पड़ा।

दरअसल 2018-19 में शिक्षाकर्मियों का जो आंदोलन हुआ वह कई मायनों में पुराने आंदोलनों से अलग था । शिक्षाकर्मी जो परंपरागत हड़ताल करते थे उसमें शासन , प्रशासन और समाज तीनों ही शिक्षकों के खिलाफ खड़े नजर आते थे क्योंकि इसमें सीधे तौर पर बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होता है और इसके चलते ही शिक्षाकर्मी की भूमिका हड़ताल कर्मी की बन चुकी थी । लेकिन 2019 में शिक्षाकर्मियों ने जनवरी से लेकर संविलियन की घोषणा होने तक सोशल मीडिया के जरिए सविलियन क्रांति की ऐसी अलख जगाई कि शासन-प्रशासन चाह कर भी उसे न बुझा सके ।

नतीजतन मजबूरी में ही सही सरकार को शिक्षाकर्मियों के संविलियन की घोषणा करनी पड़ी लेकिन मजबूरी में किए गए इस घोषणा में एक बार फिर वर्ष बंधन का चाबुक शामिल था जिसकी मार सीधे 8 वर्ष से कम सेवा अवधि वाले शिक्षकों के पेट पर पड़ी ।

इस से नाराज शिक्षाकर्मियों ने सीधे तौर पर भाजपा सरकार को 15 सीटों पर समेट देने की चुनौती दी और आश्चर्यजनक रूप से यह कारनामा भी हो गया ऐसा माना जाता है कि भाजपा की हार में सबसे बड़ी भूमिका इन्हीं नाराज शिक्षाकर्मियों की थी । शिक्षाकर्मियों की इस नाराजगी का भरपूर लाभ कांग्रेस ने भी उठाया और नाराज शिक्षाकर्मियों के नेतृत्वकर्ताओं से मुलाकात करके उनके मुद्दे को अपनी घोषणा पत्र में प्रमुखता से शामिल किया । लेकिन अब वही मांग कांग्रेस सरकार के भी गले की फांस बन सकती है क्योंकि आने वाले दिनों में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव है जिस पर शिक्षाकर्मियों की नाराजगी का सीधा असर पड़ सकता है ।

*पंचायत मंत्री और मुख्यमंत्री से शिक्षाकर्मी सोशल मीडिया के जरिए लगा रहे हैं गुहार*

इधर संविलियन से वंचित शिक्षाकर्मी एक बार फिर सोशल मीडिया जैसे माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री और पंचायत मंत्री को अपनी व्यथा सुना रहे हैं इसका असर भी हो रहा है मुख्यमंत्री और पंचायत मंत्री तक यह बात लगातार पहुंच रही है कि रोज हजारों की तादाद में शिक्षाकर्मी उन से गुहार लगा रहे हैं *पंचायत मंत्री टी एस सिंहदेव की तरफ से तो बकायदा शिक्षाकर्मियों को जवाब भी दिया गया है और उन्हें बताया गया है कि आप की दुविधा हमारे संज्ञान में है* इसका सीधा मतलब है की सोशल मीडिया के जरिए एक बार फिर शिक्षाकर्मियों की आवाज सीधे उन कानों तक पहुंच रही है जहां वह पहुंचाना चाहते हैं । इस पर निर्णय कब होता है यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन निश्चित तौर पर सोशल मीडिया एक बार फिर ऐसा प्लेटफॉर्म बन कर सामने आ रहा है जिसमें न तो शिक्षाकर्मियों की छवि खराब हो रही है और न ही बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है बल्कि शिक्षाकर्मियों का जो मुख्य उद्देश्य है यानी सरकार तक अपनी बात पहुंचाना वह सीधे तौर पर सरकार तक पहुंच रही है जिसे एक अच्छी पहल मानी जा सकती है क्यों की सड़क पर आकर होने वाली हड़ताल से दोनों पक्षों का बराबर नुकसान होता है ।