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छत्तीसगढ़ी प्रेम

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14 अप्रैल
भूपेश बघेल के सीएम बनने से ये तो हुआ है कि सूबे में छत्तीसगढ़ी को अहमियत मिलने लगी है। अल सुबह नगर निगम की कचरा उठाने वाली गाड़ियां से अब हिन्दी सांग गायब हो गए हैं। छत्तीसगढ़ी शुरू हो गई है….कचरा वाला गाड़ी आए हे, कचरा ले जाए…। प्रेस कांफ्रेंसों में छत्तीसगढ़ी में सवाल हो रहे हैं। तो नौकरशाह भी पीछे नहीं हैं। वे भी अब छत्तीसगढ़ी पर जोर दे रहे हैं। दरअसल, इस समय दिक्कत यह है कि भूपेश बघेल किसी को नजदीक फटकने दे नहीं रहे। ऐसे में, कुछ अधिकारियों ने सीएम के नजदीक जाने के लिए छत्तीसगढ़ी बोलने का अभ्यास चालू कर दिया है। नौकरों एवं ड्राईवरों को बकायदा कहा जा रहा है, वे छत्तीसगढ़ी में ही बात करें। नौकर हैरान हैं, साब को ये क्या हो गया है….साब तो पहले उनकी बात सुनकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। चलिये, ये आइडिया उनका शायद काम आ जाए….।

नो टेंशन

विधानसभा चुनावों में कलेक्टर, एसपी को काफी टेंशन रहता है। रुलिंग पार्टी का प्रत्याशी अगर हार गया और फिर से उस पार्टी की सरकार बन गई तो उसकी खैर नहीं। और, सरकार बदल भी गई और वहां अगर नई सरकार का प्रत्याशी हारा तो भी कुर्सी गई समझिए। विधानसभा चुनाव में विपक्ष के प्रत्याशी जिन-जिन जिलों से जीते, आखिर उनमें जांजगीर के कलेक्टर नीरज बंसोड़ ही अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे। मगर लोकसभा चुनाव में चूकि राज्य की सत्ता नहीं बदलती, इसलिए उन्हें कोई टेंशन नहीं रहता। फिर, नतीजों के आधार पर कलेक्टरों के कामकाज का मूल्यांकन भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि, दो महीने पहिले अधिकांश की पोस्टिंग हुई है। काम करके दिखाने के लिए ये समय काफी कम होता है। ऐसा ही कुछ एसपी के साथ भी होता है।

विधायकों की मुश्किलें

लोकसभा चुनाव को लेकर ब्यूरोक्रेट्स को कोई फिकर नहीं है मगर सत्ताधारी पार्टी के विधायकों के तनाव के बारे में पूछिए मत! विधानसभा चुनाव से अभी संभले नहीं कि 11 की 11 सीटें देने की चुनौती। जाहिर है, जिस विधायक के इलाके में अगर पार्टी का पारफारमेंस गड़बड़ाया तो उनका आगे का रास्ता ब्लॉक हो जाएगा। लोकसभा चुनाव के बाद बोर्ड, आयोगों में नियुक्तियां होनी है। लोकसभा चुनाव के नतीजों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा, दो दर्जन से अधिक बोर्ड, आयोगों में किन विधायकों को बिठाया जाए। ऐसे में, टेंशन रहना स्वाभाविक है।

अब खैर नहीं!

लोकसभा चुनाव के बाद गाड़ियों के शौकीन नौकरशाहों की मुश्किलें बढ़ सकती है। वित्तीय संकट का सामना रही सरकार की नोटिस में ये बात आई है कि अधिकांश नौकरशाह तीन-तीन, चार-चार गाड़ियां रखे हुए हैं। नियमानुसार उन्हें स्टेट गैरेज से एक गाड़ी मिलती है। लेकिन, अफसरों ने डायरेक्ट्रेट की गाड़ियों को भी अपने बीवी-बच्चों के लिए रख ही लिया है, उपर से किराये की गाड़ी भी ले लिया है। सीएम के एक नजदीकी ने बताया कि चुनाव के बाद सरकार इस पर संज्ञान लेगी। हालांकि, गलती अफसरों की भी नहीं है। ब्यूरोक्रेसी में गाड़ी और बंगला, दो से ही स्टेट्स और प्रभाव का पता चलता है। अगर बंगले में पुणे, अहमदाबाद का इंटिरियर ने काम नहीं किया है और गाड़ी बढ़ियां नहीं है तो अफसर बिरादरी में उसकी कोई हैसियत नहीं होती।

होम कैडर

यह पहला मौका होगा, जब यूपीएससी मेंं सलेक्ट छत्तीसगढ़ के दो आईएएस को होम कैडर मिलेगा। दंतेवाड़ा की नम्रता जैन और बिलासपुर के वर्णित नेगी को यह लगभग तय हो गया है कि उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिलेगा। इससे पहिले ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक बैच के दो आईएएस को होम कैडर मिला हो। वैसे, 13 साल बाद ये भी हुआ कि यूपीएससी में अंडर फिफ्टीन में छत्तीसगढ़ से दो को अवसर मिला। नम्रता को 12वां और नेगी को 13वां रैंक मिला है। इससे पहिले 2006 में बिलासपुर की आनंदिता मित्रा ने देश में आठवां और महिलाओं में पहला पोजिशन हासिल किया था। आनंदिता को पंजाब कैडर मिला था।

ब्यूरोक्रेट्स और चुनाव

छत्तीसगढ़ से भले ही किसी नौकरशाह को लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला लेकिन, देश में इस बार बड़ी संख्या में रिटायर आईएएस, आईपीएस चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि, नौकरशाहों के साथ दिक्कत यह होती है कि पूरी नौकरी करने के बाद रिटायरमेंट के बाद वे राजनीति ज्वाईन करते हैं और वो भी जागते हैं पांच साल में एक बार। सिर्फ चुनाव के समय। यही वजह है कि राजनीतिक उन्हें पसंद नहीं करते तो जनता भी उन्हें आमतौर पर खारिज कर देती है। छत्तीसगढ़ में रिटायर नौकरशाही से जितने भी नाम चुनावी चर्चे में आते हैं, सबके साथ यही चीजें हैं। ओपी चौधरी नौकरी छोड़कर राजनीति में आए और लगातार सक्रिय होकर राज्य का दौरा कर रहे हैं। बाकी, सभी फिर अब 2023 में सक्रिय होंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बर्खास्त हुए किस आईएएस की जल्द ही नौकरी में वापसी हो सकती है?
2. रिटायर आईएएस सरजियस मिंज को कांग्रेस ने रायगढ़ से टिकिट क्यों नहीं दिया?