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सीएम के कड़वे बोल

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24 मार्च 2019
छत्तीसगढ़ में आईएएस, आईपीएस की पोस्टिंग, ट्रांसफर पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ जाती है। बिहार में वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भरी मीटिंग में ऐसा कुछ बोल गए कि ब्यूरोक्रेसी स्तब्ध रह गई। पटना में गृह और पुलिस विभाग के अफसरों की मीटिंग में डीजीपी की ओर मुखातिब होकर नीतिश बोले….डीजीपी साब अखबारों का हेडलाइन मत बनिये…मीडिया वाले किसी के नहीं होते….वही आपको निबटा देंगे। दरअसल, डीजीपी कुछ दिनों से रोज अखबारों में फ्रंट पेज पर छप रहे थे। जाहिर है, डीजीपी जैसे सीनियर अफसर के खिलाफ किसी सीएम का काफी कडवा बोल होगा।

दबदबा

छत्तीसगढ़ में समय-समय पर राज्य विशेष के अफसरों का दबदबा रहा है। कभी बिहार, यूपी तो कभी साउथ तो कभी उड़ीसा के। एक समय तो सरकार में उड़ीया अफसरों की तूती बोलती थी। एसके मिश्रा, इंदिरा मिश्रा, बीकेएस रे, एमके राउत…और भी कई। अभी मराठी अफसर ठीक-ठाक स्थिति में हैं। याद होगा, पहले सिर्फ एक मराठी कलेक्टर होते थे….सिद्धार्थ कोमल परदेशी। अब चार हो गए हैं। कैसर हक कोरबा से लौट आए, वरना पांच होते। फिलहाल, अय्याज तंबोली जगदलपुर कलेक्टर हैं। नीलेश क्षीरसागर जशपुर, सर्वेश भूरे मुंगेली और विलास संदीपन कोरिया। रायपुर के एसएसपी शेख आरिफ भी पुणे से हैं। दरअसल, पिछले कुछ सालों में मराठी अफसरों की तादात ज्यादा रही। जैसे, 2007 तक छत्तीसगढ़ में साउथ के अफसर काफी आए। अब चार-पांच साल से बिहार, यूपी से आईएएस आ रहे हैं।

आयोग और सरकार

छत्तीसगढ़ में चुनाव आयोग और राज्य सरकार में इस बार तालमेल की बड़ी वजह सुनील कुजूर का चीफ सिकरेट्री होना है। कुजूर लंबे समय तक न केवल राज्य निर्वाचन अधिकारी रहे हैं, बल्कि विभिन्न राज्यों के विधानसभा, लोकसभा चुनावों में आठ बार आब्जर्बर रहने का उन्हें मौका मिला है। आयोग के सिस्टम को वे बखूबी समझते हैं। इसलिए, चुनाव के ऐलान होने से पहिले ही जिन अफसरों पर आयोग की कार्रवाई हो सकती थी, उन्हें बदलने में देर नहीं लगाई। राज्य निर्वाचन अधिकारी सुब्रत साहू के लिए भी यह कंफर्ट स्थिति होगी। बिना किसी विवाद के सरकार से सारे काम हो जा रहे। वैसे, तकरार न हो, ये ही अच्छा है….आखिर दो महीने बाद सुब्रत को मंत्रालय में ही जाना है।

प्रतिष्ठा का सवाल

सरकार और पार्टी का मुखिया होने के नाते वैसे तो सीएम भूपेश बघेल के लिए सूबे की सभी ग्यारह सीटें महत्वपूर्ण है। लेकिन, बिलासपुर से अपने सबसे करीबी अटल श्रीवास्तव को टिकिट दिलाकर उन्हें निजी तौर पर खुशी मिली होगी। तीन महीने पहिले हुए विधानसभा चुनाव में लाख कोशिश के बाद भी ऐसी सिचुएशन बनी कि अटल टिकिट से वंचित हो गए। टीएस सिंहदेव कैम्प के शैलेष पाण्डेय अटल को मात देने में कामयाब रहे। इस बार भी बिलासपुर लोकसभा सीट की बारी आई तो अटल को रोकने के लिए खूब सियासी दांव चले गए। मगर अंततोगत्वा दिल्ली से अटल का नाम फायनल हो गया। सीएम भूपेश से अटल के पुराने रिश्ते हैं। मध्यप्रदेश के समय भूपेश जब मंत्री थे, उस समय अटल उनके सबसे खास होते थे। भरोसे का यह रिश्ता दो दशक बाद भी कायम रहा। पीसीसी चीफ बनते ही भूपेश ने अटल को प्रदेश कांग्रेस का महामंत्री बनाया था। कांग्रेस सरकार में अटल का रुतबा किसी मंत्री से कम नहीं है….अधिक ही बोल सकते हैं।

भाभी, देवर में फंसी सीट

जांजगीर लोकसभा सीट से जयंत मनहर टिकिट के मजबूत दावेदार थे। जयंत लोकसभा और राज्यसभा में छत्तीसगढ़ का कई बार प्रतिनिधित्व कर चुके भगतराम मनहर के बेटे हैं। उनकी मां कमला मनहर भी राज्यसभा सदस्य रहीं हैं। लेकिन, दिलचस्प यह है कि जांजगीर सीट से ही जयंत की भाभी पदमा मनहर भी लोकसभा की टिकिट मांग रही थीं। भाभी-देवर के चक्कर में न पड़ते हुए कांग्रेस आलाकमान ने परसराम भारद्धाज के बेटे रवि भारद्वाज को जांजगीर की टिकिट दे दी।

दो के जवाब में दो?

भाजपा ने लोकसभा के पांच प्रत्याशियों का एनाउंस किया है, इनमें दो महिला हैं सरगुजा से रेणुका सिंह और रायगढ़ से गोमती साय। चर्चा है, कांग्रेस दो के जवाब में दो महिलाओं को उतार सकती है। दुर्ग से प्रतिमा चंद्राकर और कोरबा से ज्योत्सना महंत। इन दोनों को छोड़कर कांग्रेस ने बाकी सभी नौ सीटों के उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। हालांकि, कोरबा और दुर्ग का ड्रॉप करने के पीछे कांग्रेस देख रही है कि भाजपा किसे वहां से उतारती है। कोरबा से कहीं बीजेपी ने किसी दमदार को टिकिट दे दिया तो हो सकता है स्पीकर चरणदास महंत पर प्रेशर पड़े के वे स्पीकर से इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव लड़े। क्योंकि, पार्टी में अधिकांश नेताओं का मानना है कि कोरबा सीट को दाउ याने चरणदास ही निकाल सकते हैं।

पिता का बदला

जांजगीर लोकसभा सीट से भाजपा ने गुहाराम अजगले को मैदान में उतारा है तो कांग्रेस से रवि भारद्वाज हैं। गुहाराम सारंगढ़ से एक बार सांसद रह चुके हैं। सारंगढ़ से लोकसभा चुनाव में उन्होंने परसराम भारद्वाज को हराया था। परसराम के बेटे रवि अब उनके सामने हैं। देखना हैं, रवि अपने पिता की हार का हिसाब चुकता करने में कामयाब होते हैं या गुहाराम पिता के बाद बेटे को भी सियासी जंग में मात दे देंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरगुजा से खेल साय को लोकसभा चुनाव में उतारने के पीछे कौन सा सियासी खेल है?
2. विधानसभा चुनाव में प्रमोद दुबे ने बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ चुनाव लड़ने से मना कर दिया था तो क्या प्रमोद के खिलाफ बृजमोहन अग्रवाल चुनाव लड़ेंगे?