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ब्यूरोक्रेसी की पीड़ा

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13 जनवरी 2019
राज्य बनने के आठ बरस बाद 2010 में नौकरशाही ने लड़-भिड़कर चीफ सिकरेट्री का बंगला ईयर मार्क कराया था। वरना, पी जॉय उम्मेन तक देवेंद्र नगर में रहते थे। वहीं से वे शंकर नगर के ईयर मार्क बंगले में आए। इसके बाद सुनील कुमार, विवेक ढांड और अजय सिंह सीएस बंगले में रहे। इस बंगले से कई नौकरशाहों की अपनी ख्वाहिशें थीं, कई सपने थे…कुछ की पूरी हुई, कुछ उसे संजो कर रखे थे, काश! उपर वाला एक बार मौका दे दे। इससे पहिले, भूपेश सरकार के एक मंत्री की नजर इस बंगले पर लग गई। और, वह ब्यूरोक्रेसी के हाथ से चला गया। चीफ सिकरेट्री सिर्फ पद नहीं होता बल्कि ब्यूरोक्रेसी का मुखिया होता है। जाहिर है, बिरादरी के सम्मान से जुड़ा मामला है। उसका बंगला छीन जाए….। ब्यूरोक्रेट्स को इसका कितना दर्द होगा, इसे कोई और नहीं समझ सकता। 15 साल वाली सरकार होती तो कोई मंत्री ऐसा करके दिखाता….आईएएस लॉबी चढ़ बैठती। लेकिन…..। आईएएस का व्हाट्सएप ग्रुप, जो कभी ऐसे विषयों पर पानीपत का मैदान बन जाता था, उसमें दो अफसरों ने सिर्फ लिखा-बैड। इसके अलावा किसी ने कुछ बोलने-करने की हिमाकत नहीं की। हालांकि, ये ठीक नहीं हुआ। सिस्टम का सम्मान होना चाहिए। आईएएस अफसरों को इसके लिए सीएम के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए थी। वे बिल्कुल इससे एग्री करते। लेकिन, उन तक बात ही नहीं पहुंची।

भूपेश के मंत्री

सीएम भूपेश बघेल मंत्रियों के मामले में किस्मत वाले हैं। रमन सिंह मंत्रिमंडल में तीन-चार के बाद बुरे हाल थे। भूपेश सरकार के लगभग सभी मंत्री अनुभवी हैं। कवासी लकमा तक चौथी बार विधायक हैं। रमन सिंह के समय राजेश मूणत, केके बांधी, रेणुका सिंह, केदार कश्यप, विक्रम उसेंडी पहली बार विधायक चुने गए थे। वे मंत्री का पहले शपथ लिए, विधायक का बाद में। हालांकि, तीसरी पारी में भी मंत्रियों के हाल जुदा नहीं रहे। भाजपा के पास शिवरतन और देवजी भाई, दो-एक चेहरे थे भी तो एक जिले में कितने को मंत्री बनाती, यह समस्या थी।

फास्ट मंत्री

मोहम्मद अकबर विभागों के मामले में भूपेश सरकार के सबसे वजनदार मंत्रियों में शामिल हैं, तो काम में भी वे सबसे आगे निकलते दिख रहे हैं। बिलासपुर के कानन-पेंडारी जू में सफेद शेर की मौत पर वे बिलासपुर पहुंच गए। वन विभाग के अफसर भी आवाक थे। पहले कई-कई शेर मर गए। कभी डीएफओ भी नहीं गया। राजनांदगांव के छुरिया में तो गांव के लोगों ने शेरनी को लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला था। कुछ नहीं हुआ। इस बार हाथियों से दो ग्रामीणों की मौत के बाद मंत्री ने वाईल्डलाइफ के अपने सबसे बड़े अफसर पीसीसीएफ कौशलेंद्र सिंह को फौरन सरगुजा भेज दिया। जबकि, 2010 के बाद आठ सालों में 110 से अधिक लोग हाथियों के शिकार हुए हैं। मंत्री का यही तेवर रहा तो आईएफएफ अब वाईल्डलाइफ में जाने से बचेंगे। अभी तक तो मंत्रियों के यहां वाईल्डलाइफ के लिए बोली लगती थी।

थ्री इडियट…थ्री स्टार

रमन सरकार के समय तीन आईपीएस की एक फोटो वायरल हुई थी, जिसका स्लोगन था, थ्री इडियेट। सोशल मीडिया में इसे आईजी एसआरपी कल्लूरी ने पोस्ट की थी। और, उसमें कल्लूरी के अलावा आरएन दास और ऐलेसेना, अकबर, अहमद और अंथॉनी के स्टाईल में खड़े थे। यह उस समय की बात है, जब कल्लूरी बस्तर के आईजी थे। और आरएन दास जगदलपुर और ऐलेसेला सुकमा के एसपी। दोनों एसपी कल्लूरी के बेहद विश्वास प्राप्त थे। और, उन्हीं की बदौलत उन्होंने बस्तर में माओवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। लेकिन, बेला भाटिया प्रकरण में जब देशव्यापी बवाल हुआ तो सरकार ने कल्लूरी और दास को हटा दिया था। और, माओवादियों से समर्थन रखने वालों को गाड़ियों से कुचल कर मार डालने का बयान दिया तो ऐलेसेला की छुटटी कर दी थी। इसके बाद थ्री इडियट वायरल हुआ। लेकिन, वक्त का खेल देखिए। कल्लूरी आज एसीबी, ईओडब्लू के आईजी के साथ ही नान घोटाले के एसआईटी के प्रमुख भी। दास जांजगीर के कप्तान बन गए हैं तो ऐलेसेला नारायणपुर के एसपी के साथ ही नान मामले के एसआईटी के सदस्य भी। इसलिए, अब पुराना पोस्ट भूल जाइये, अब ये थ्री स्टार हो गए हैं।

कल्लूरी के तीसरे गुरू?

दिसंबर 2003 में सूबे में जब बीजेपी की सरकार बनीं तो अजीत जोगी से रिश्तों के चलते आईपीएस एसआरपी कल्लूरी बियाबान में चले गए थे। कल्लूरी मेन ट्रेक पर तब आए, जब अशोक दरबारी के हटने के बाद 2004 के मध्य में ओपी राठौर डीजीपी बनें। बता दें, छत्तीसगढ़ में अब तक जितने भी डीजीपी बनें हैं, राठौर उनमें सर्वाधिक तेज और रिजल्ट देने वाले पुलिस प्रमुख रहे। अफसरों और जवानों से उन्हें काम लेने आता था। राठौर को जब कल्लूरी के बारे में पता चला तो उन्होंने बुलाकर बात की। फिर सीएम रमन सिंह को कंविंस किया….मैं उसे बलरामपुर पुलिस जिले का कप्तान बनाना चाहता हूं। रमन सिंह ने ओके कर दिया। कल्लूरी ने भी कलेजा पर पत्थर रखकर इसे चुनौती की तरह लिया। कलेजा पर पत्थर इसलिए, क्योंकि वे जशपुर, कोरबा और बिलासपुर जैसे जिले का कप्तान रह चुके थे। और, जोगी शासन काल में उनकी तूती बोलती थीं। उन्हें पुलिस जिले में एसपी बनना पड़ा। सरगुजा इलाके से जब नक्सलियों का सफाया कर कल्लूरी ने जब सरकार को चमत्कृत किया तो उन्हें दंतेवाड़ा का डीआईजी बनाया गया। दंतेवाड़ा में स्वामी अग्निवेश पर टमाटर और पत्थर फेंके गए। दिल्ली में माओवादियों के समर्थकों ने जब कोहराम मचाया तो सरकार ने कल्लूरी को वहां से हटा दिया। इसके बाद 2014 में एएन उपध्याय डीजीपी बनें। उन्होंने मजबूत फील्डिंग करके कल्लूरी को बस्तर का आईजी बनवाया। कल्लूरी जब बलरामपुर में एसपी थे तब उपध्याय सरगुजा का आईजी रहे। दोनों में तब की केमेस्ट्री थीं। कल्लूरी प्रेम को लेकर पुलिस महकमे में उपध्याय पर हमेशा कमेंट्स किए जाते रहे। लेकिन, वे कल्लूरी के पीछे खड़े रहे। बाद में बेला भाटिया प्रकरण में जब सोशल मीडिया में रमन सरकार के खिलाफ इस कदर हल्ला मचा कि डीजीपी भी असहाय हो गए। अलबत्ता, भूपेश सरकार में कल्लूरी फिर मेन स्ट्रीम में आ गए हैं। किन्तु ये अभी पूरी तरह क्लियर नहीं हुआ है कि राठौर, उपाध्याय के बाद इस बार कल्लूरी की वापसी में किसका रोल रहा है। पता चलेगा, तो आगे के कॉलम में जरूर बताएंगे।

दाल नहीं गली

निवर्तमान डीजीपी एएन उपध्याय को आईजी, डीआईजी लेवल के कुछ आईपीएस कान फूंकने पहुंचे….साब आपको सरकार हटा ही नहीं सकती। देखा नहीं आपने, केरल में कैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वहां के हटाए गए डीजीपी ने किस तरह चार्ज ले लिया। बताते हैं, इस पर उपध्याय चिर-परिचित अंदाज में हल्का मुस्कराए। फिर, चेहरा किंचित सख्त कर बोले, पांच साल डीजीपी रह लिया हूं….अब अगर सुप्रीम कोर्ट जाउंगा तो लोग मुझे जू…..मारेंगे…..बोलेंगे, इसका कुर्सी से मोह नहीं जा रहा है….इसलिए ये काम मैं नहीं करने वाला। इसके बाद अफसर अपना मुंह लेकर लौट गए।

रमन की कुर्सी

विधानसभा में चीफ मिनिस्टर के नाते डा0 रमन सिंह को 15 साल तक बड़ा सा चेम्बर मिला था। साथ ही उनके अफसरों को बैठने के लिए भी सचिवालय भी रहा। लेकिन, अब वे सीएम रहे नहीं। नेता प्रतिपक्ष भी धरमलाल कौशिक बन गए हैं। विधानसभा में सीएम के बाद सिर्फ नेता प्रतिपक्ष और मंत्रियों को अलग से कमरा मिलता है। विधायक इधर-उधर बैठकर गुजारा करते हैं। मगर 15 साल के सीएम तो ऐसा नहीं कर सकते न। लिहाजा, रमन सिंह के लिए नेता प्रतिपक्ष के कमरे में कौशिक के बगल में एक कुर्सी लगाई गई है। इसी कुर्सी पर रमन बैठते हैं। हालांकि, इससे पहिले जब रविंद्र चौबे नेता प्रतिपक्ष थे और नंदकुमार पटेल पीसीसी अध्यक्ष तो उनके लिए भी चौबे के बगल में कुर्सी लगाई जाती थी। इसी तरह नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के बगल में पीसीसी चीफ भूपेश बघेल बैठते थे। दरअसल, पार्टी अध्यक्ष भी रुतबेदार पद होता है, विधायकों की लाईन में तो वह बैठ नहीं सकता। लेकिन, बीजेपी में कौशिक जब तक नेता प्रतिपक्ष के साथ बीजेपी अध्यक्ष बने हुए हैं, तब तो ठीक है। लेकिन, दूसरा कोई अध्यक्ष बनेगा तो उसके लिए नेता प्रतिपक्ष के बगल में एक कुर्सी और लगानी पड़ेगी।

महंत का बंगला

गौरीशंकर अग्रवाल के 24 एसी वाला बंगला अब नए स्पीकर चरणदास महंत को मिल गया है। जल्द ही वे वहां शिफ्थ होंगे। लेकिन, पता चला है देवेंद्र नगर का बंगला भी वे अपने पास रखेंगे। देवेंद्र नगर का बंगला उन्हें काफी शूट किया। वहीं से वे केंद्रीय मंत्री बनें और अब राज्य की राजनीति में वापसी करते हुए स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब हुए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बस्तर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष कौन होगा, लखेश्वर बघेल या मनोज मंडावी?
2. डीजीपी एएन उपध्याय को हटाने के लिए जम्मू-कश्मीर के सीएस सुब्रमणियम की क्यों मदद लेनी पड़ी?