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….तो क्या चंद्रदेव राय शिक्षाकर्मियों के हक के लिए उठाएंगे पार्टी के भीतर आवाज ?…..लोकसभा चुनाव से पहले शिक्षाकर्मियों को हक दिला पाये तो बढ़ जायेगा कद

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रायपुर 12 जनवरी 2019। शिक्षाकर्मियों के संविलियन का मसला फिर गरम है। वजह कांग्रेस के वादों में दर्ज संविलियन के मुद्दे का कैबिनेट के बाद अनुपूरक तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ जाना। लिहाजा शिक्षाकर्मी अब अधीर हो रहे हैं। अब उनकी नजरें कांग्रेस पर तो टिकी है ही…अपने उस नेता पर भी टिकी है, जो कभी रमन सरकार में संविलियन से वंचित रहे शिक्षाकर्मियों के हक में आवाज में उठाते रहे और कांग्रेस सरकार में शिक्षाकर्मी से अब कांग्रेस विधायक बन गये हैं। इस पूरे मसले पर विधायक चंद्रदेव राय की खामोशी से शिक्षाकर्मी बिरादरी में सस्पेंस बढ़ा दिया है। हालांकि दबी जुबान में ये सवाल उठ भी रहा है कि ” क्या जिन्होंने रमन सरकार में रहते संविलियन के आंदोलन की अगुवाई की थी…तो कांग्रेस विधायक बनने के बाद शिक्षाकर्मियों के संविलियन की आवाज बुलंद करेंगे, वो भी तब जब कांग्रेस के घोषणा पत्र में वो वादा शामिल हैं।

जानकार मानते हैं कि शिक्षाकर्मी की अगुवाई ने ही चंद्रदेव राय को नेता और फिर विधायक की कुर्सी तक पहुंचाया। आंदोलन की वजह से चंद्रदेव राय को इसका दोहरा लाभ हुआ , संघर्ष मोर्चा के बैनर तले हुए इस आंदोलन से शिक्षाकर्मियों ने संविलियन की लड़ाई जीत ली हालांकि यह जीत आंशिक ही थी क्योंकि भाजपा ने वर्ष बंधन का एक ऐसा फार्मूला लागू किया जिसने शिक्षाकर्मियों को सीधे-सीधे दो हिस्सों में बांट कर रख दिया । चंद्रदेव राय और विकास राजपूत के संगठन ने इसका सबसे पहले विरोध किया और प्रदेश के सभी शिक्षाकर्मियों को संविलियन का लाभ देने की बात कही , सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी लेकिन 8 वर्ष से नीचे के शिक्षाकर्मियों के आक्रोश को देखते हुए विपक्ष को भी यह बात समझ में आ चुका था की संविलियन की सौगात पाने के बावजूद शिक्षाकर्मी नाराज है ।

वर्ष बंधन और वेतन विसंगति समाप्ति की मांग चुनाव के ठीक पहले तक जोर पकड़ती रही और इसी बीच संविलियन का लाभ पा चुके चंद्रदेव राय ने कांग्रेस का दामन थाम लिया कांग्रेस ने भी शिक्षाकर्मियों के गुस्से को भांपते हुए चंद्रदेव राय को बिलाईगढ़ से अपना प्रत्याशी नियुक्त कर दिया इसका सीधा लाभ यह हुआ कि शिक्षाकर्मियों के मन में यह बात घर कर गई कि कांग्रेस उन्हें संजीदगी से ले रही है । एक तरफ जहां जनघोषणा पत्र में वर्ष बंधन समाप्ति का मुद्दा पहले स्थान पर दिखाई दे रहा था वही चंद्रदेव राय अब विधायक का चुनाव लड़ने जा रहे थे। इसके बाद तो जैसे शिक्षाकर्मियों ने तख्ता पलट का ऐलान ही कर दिया । सोशल मीडिया के उनके ग्रुप में भाजपा को बुरी तरह से हराने के मैसेज वायरल होने लगे पूरे प्रदेश में इसका असर भी दिखा जहां किसानों और शिक्षाकर्मियों के सहयोग से कांग्रेस अविश्वसनीय जीत हासिल करने में सफल रही वहीं चंद्रदेव राय भी श्याम टंडन और सनम जांगड़े जैसे धाकड़ नेताओं को हराकर विधानसभा में पहुंचने में सफल हो गए।

इधर जिस लड़ाई को चंद्रदेव राय ने अधूरे में छोड़ा था उसे पूरा करके कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भी शिक्षाकर्मियों से समर्थन दिलाने का उनके पास बेहतरीन अवसर है क्योंकि जिन शिक्षाकर्मियों को अभी संविलियन का लाभ नहीं मिला है वह आने वाले दो-तीन सालों में स्वाभाविक रूप से संविलियन पा ही जाएंगे पर इसका फायदा कांग्रेस को नही होगा लेकिन यदि इससे पहले चंद्रदेव राय उनकी आवाज को अपनी पार्टी के भीतर बुलंद करते हुए जन घोषणा पत्र के प्रथम बिंदु को पूरा करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर वह प्रदेश की जनता को यह संदेश देने में सफल हो जाएंगे की उनका विधानसभा पहुंचना शिक्षाकर्मियों के लिए सार्थक साबित हुआ । ऐसे भी वर्ष बंधन समाप्ति के विषय में स्कूल शिक्षा मंत्री पहले ही स्पष्ट संकेत दे चुके हैं और उन्होंने अपने बयान में इस बात के संकेत दिए थे कि अब प्रदेश के शिक्षाकर्मियों को संविलियन के लिए 8 वर्ष का इंतजार नहीं करना होगा और 2 वर्ष की सेवा पूर्ण करने वाले शिक्षाकर्मियों का संविलियन कर दिया जाएगा । ऐसे में यदि चंद्रदेव राय अपनी उपस्थिति वाले किसी मंच से इसकी घोषणा कराने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर नए नवेले इस विधायक का कद कई गुना और बढ़ सकता है….. हालांकि सदन के अपने प्रारंभिक भाषण में चंद्रदेव राय ने शिक्षाकर्मियों के विषय में कोई बात नहीं कही लेकिन शिक्षाकर्मियों को पूरी उम्मीद है कि चंद्रदेव राय जिस लड़ाई को आधी अधूरी छोड़कर सदन में पहुंचे हैं उसे वह जरूर पूरी करेंगे क्योंकि इसके लिए उनके पास स्वर्णिम मौका है । अब देखना होगा चंद्र देव राय आने वाले समय में शिक्षाकर्मियों की आवाज बुलंद करते हैं या नहीं या फिर मध्य प्रदेश के शिक्षाकर्मियों की तरह छत्तीसगढ़ के शिक्षाकर्मियों को भी निराशा ही हाथ लगेगी । गौरतलब है कि वहां से भी शिक्षाकर्मी नेता मुरलीधर पाटीदार को विधानसभा पहुंचने का मौका मिला था लेकिन अब इसे उनकी निष्क्रियता कहिए या कुछ और लेकिन इस बार वह चुनाव हार गए है ।