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CBI चीफ पद से आलोक वर्मा ने दिया इस्तीफा…. अपने इस्तीफे में लिखा – ‘ ब्योरोक्रेट के रूप में मेरा चार दशक का करियर ईमानदार व बेदाग रहा…..फैसले में स्वाभाविक न्याय का गला घोंटा गया”

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नयी दिल्ली 11 जनवरी 2019। आखिरकार सीबीआई चीफ आलोक वर्मा ने अपना इस्तीफा आज दे दिया। उनका कार्यकाल 31 जनवरी तक का था, लेकिन तीन सदस्यीय कमेटी के प्रस्ताव पर उन्हें पद से हटा दिया गया। कार्मिक एवं प्रशि‍क्षण विभाग को लिखे अपने इस्तीफा पत्र में वर्मा ने कहा है कि चयन समिति ने उन्हें हटाने का निर्णय लेने से पहले अपनी बात ब्योरेवार ढंग से रखने का मौका नहीं दिया, जैसा कि सीवीसी में रिकॉर्ड हुआ था. उन्होंने कहा, ‘मुझे सीबीआई के डायरेक्टर पद से हटा दिया गया और इस प्रक्रिया में स्वाभाविक न्याय का गला घोंटा गया और पूरी प्रक्रिया को उलट-पुलट दिया गया. चयन समिति ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि सीवीसी की पूरी रिपोर्ट एक ऐसे शिकायतकर्ता के आरोपों पर आधारित थी जो खुद सीबीआई जांच के घेरे में है. ‘

कल का निर्णय इस बात का सबूत है कि एक संस्था के रूप में सीबीआई के साथ सरकार किस तरह का सुलूक कर रही है. वर्मा ने अपने इस्तीफे में लिखा है, ‘एक अफसरशाह के रूप में मेरे चार दशक के करियर में मैं हमेशा ईमानदारी के रास्ते पर चला हूं. आईपीएस के रूप में भी मेरा रेकॉर्ड बेदाग रहा है. मैंने अंडमान-निकोबार, पुडुच्चेरी, मिजोरम, दिल्ली में पुलिस बलों की अगुवाई की और दिल्ली कारागार तथा सीबीआई की भी अगुवाई की. मुझे इन सब बलों से अमूल्य समर्थन मिला है.’

आपको बता दें कि1979 बैच के एजीएमयूटी कैडर के IPS अधिकारी आलोक वर्मा का बतौर सीबीआई निदेशक कार्यकाल आगामी 31 जनवरी को पूरा होने वाला था, लेकिन कल ही उनका तबादला महानिदेशक दमकल सेवा, नागरिक सुरक्षा एवं गृह रक्षा के पद पर कर दिया गया था. प्रधानमंत्री मोदी, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए के सीकरी की समिति ने 2-1 के बहुमत से वर्मा को सीबीआई प्रमुख के पद से हटाने का फैसला किया. मोदी और न्यायमूर्ति सीकरी वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटाने के पक्ष में थे, जबकि खड़गे ने इसका विरोध किया.

पीटीआई को दिए एक बयान में आलोक वर्मा ने कहा कि ‘सीबीआई उच्च सार्वजनिक स्थानों में भ्रष्टाचार से निपटने वाली एक प्रमुख जांच एजेंसी है, एक ऐसी संस्था है जिसकी स्वतंत्रता को संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए. आगे उन्होंने कहा कि इसे बिना किसी बाहरी प्रभावों यानी दखलअंदाजी के कार्य करना चाहिए. मैंने संस्था की साख बनाए रखने की कोशिश की है, जबकि इसे नष्ट करने के प्रयास किए जा रहे हैं. इसे केंद्र सरकार और सीवीसी के 23 अक्टूबर, 2018 के आदेशों में देखा जा सकता है जो बिना किसी अधिकार क्षेत्र के दिए गए थे और जिन्हें रद्द कर दिया गया.’