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मानव हाथी द्वन्द कम करने के लिये हाथियों को ट्रान्सलोकेट करने की व्यवस्था करे वन विभाग…..

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रायपुर 9 जनवरी 2019। मानव हाथी द्वन्द कम करने के लिये मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव (वन) तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को सुझाव प्रेषित करते हुऐ रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने बताया कि मानव हाथी द्वन्द कम करने के लिये जब कभी भी स्थान विशेष पर समस्या बढ़े वहां से हाथियों को ट्रान्सलोकेट करने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब मामला तरूण या सब ऐडल्ट हाथी का हो। नर हाथी को, हाथियों का परिवार तरूण अवस्था की 10 से 14 वर्ष की उम्र में अलग कर देता है, एैसे में वह अवसाद में वैसे ही महसूस करता है जैसे बच्चा पहली बार बोर्डिंग स्कूल जाने पर महसूस करता है। सामान्यः वह कुछ समय तक अपनी मां के परिवार के आस-पास ही कुछ किलोमीटर की दूरी मंे विचरण करता है परंतु वह अपने को असुरक्षित तथा डरा हुआ समझ सकता है तथा अत्याधिक मानव दखलअन्दाजी जैसे भीड़ द्वारा घेरा जाना, लगातार सायरन वाली गाड़ियों से घण्टांे खदेड़़ा जाना, फटाखा फोडना, मिर्ची फेंकना, हाईलोजन लाइट उसे विचलित कर देती है और वह अधिक असुरक्षित और डरा हुआ महसूस करता है। नर हाथी तरूण उम्र में भी वर्ष में एक बार मद में आ सकता है और मद में आने पर आक्रमक हो जाता है। नर हाथी, परिवार से अलग होने से 10 से 15 साल तक अकेले या दूसरे नर हाथियों के साथ घूमता है तथा पुनरूत्पादन के लिये लगभग 30 वर्ष की उम्र से किसी हाथी परिवार से कुछ समय के लिये जुड़कर फिर अलग हो जाता है। नर हाथी लगभग 75 से 80 प्रतिशत जीवन अकेले गुजारता है परंतु हम उसे दल से भटका हुआ कहते है, अगर दांत है तो दल से भटका हुआ दंतेल कहते है।

सिंघवी ने बताया कि 3 वर्ष पूर्व उन्होंने वन विभाग को सुझाव दिया था कि चंूकि हाथी वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची एक में विलुप्त होती प्रजाति के कारण संरक्षित वन्यजीव है और अनुसूची एक मंे दर्ज वन्यप्राणी को पकड़कर उसे सिर्फ उचित रहवास में पुनर्वासित करने का प्रावधान है। ना तो एैसे प्राणी को बन्धक बनाया जा सकता है ना ही मारा जा सकता है। उसे उन परिस्थितियों में जब कि वह असमक्ष हो गया है और पकड़कर दूसरे वन क्षेत्र में पुनर्वासित नहीं किया जा सके तभी बन्धक बनाया जा सकता है। अतः छत्तीसगढ़ मंे आवश्यकता पड़ने पर स्वस्थ वन हाथी को ट्रानसलोकेट करने हेतु ट्रेनिंग तथा व्यवस्था करने का अुनरोध किया गया था।

अब पुनः पत्र लिखकर सुझाव दिया गया है कि हाथियों तथा मानव के बढ़ते संघर्ष को देखते हुए हाथियों को ट्रांसलोकेट करने हेतु प्रदेश मंे 4-5 हाथी बहुल्य क्षेत्रों में ट्रेनिंग इत्यादि कराने के विचार करने हेतु तथा स्प्ष्ट नीति बनाने कि किन परिस्थितियों में हाथी को ट्रांसलोकेट किया जा सकता है, की आवश्यकता है। इस संबंध में हाथी बहुल्य राज्यों में जहां हाथियांे का Translocation करवाया जाता है, वन विभाग के दल को ट्रेनिंग दिलाई जा सकती है तथा हाथी प्रभावित क्षेत्रों मंे आवश्यक सामग्री जैसे बेहोश करने की बंदूक, दवा, बेहोश करने उपरांत उठाने वाले बेल्ट, क्रेन, ट्रक की परमानेंट व्यवस्था करवाई जा सकती है इस हेतु वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया (WTI) से सहयोग लिया जा सकता है। अफ्रीका जहां सबसे ज्यादा वन हाथी है, वहां कभी भी हाथी को बन्धक नहीं बनाया जाता बल्कि समस्या होने पर उसे उचित रहवास में ट्रांसलोकेट किया जाता है। मलावी में वर्ष 2017 में 520 हाथियों को कई कि.मी. दूर ट्रानसलोकेट किया गया था जिसमें यह ध्यान रखा गया था की किसी भी परिवार का सदस्य परिवार से अलग न हो।