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37 साल के पूर्व यंग IAS ने 3 महीने में 30 साल के तिलिस्म को तोड़ने का किया दावा…. ओपी NPG से बोले- “IAS की परीक्षा में जितनी मेहनत नहीं की, उससे दोगुनी मेहनत चुनाव में की”

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satyendra singh@newpowergame.com

रायपुर 6 दिसंबर 2018। ना राजनांदगांव…ना मरवाही…और ना पाटन और ना अंबिकापुर….!! इस दफा तो चुनाव का हॉटकेक खरसिया ही रहा। जहां चुनाव से लेकर परिणाम तक पूरे देश की नजरें टिकी है। वजह है पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी…..। 37 साल का ये यंग IAS महज तीन महीने के वक्त में 30 साल के तिलिस्म को तोड़ने निकला था। अब वो तिलिस्म तोड़ पाया या नहीं…जीत पायेगा या नहीं….सूबे का दमदार कलेक्टर रहे इस शख्स को राजनीति रास आयी या नहीं…ये चर्चा तो 11 दिसंबर के बाद के लिए छोड़ते हैं, लेकिन ये तो सोलह आने सच है कि ओपी चौधरी ने अपनी राजनीति की ओपनिंग शानदार रहीं।  विरोधी कहते हैं कि वो नर्वस नाईंटीज का शिकार हो जायेंगे, लेकिन खुद ओपी चौधरी को देखकर लगता नहीं कि वो बिना शतक लगाये दम मारने वाले हैं। चुनाव की चुनौतियों से लेकर परिणाम के इंतजार तक को लेकर ओपी चौधरी ने NPG के साथ बेबाकी से बात की। ओपी बोलते हैं….

सच कहूं, IAS की पढ़ाई में जितनी मेहनत नहीं की, उससे दोगुनी मेहनत इस चुनाव में की है…. पूरे 81 दिन तक 20 घंटे लोगों के बीच गुजारा। …सिर्फ तीन से साढ़े तीन घंटे की नींद लेकर ….सुबह से देर रात तक गांव-गांव घूमता रहा। राजनीति का पहले सात से 10 दिन अति आत्मविश्वास से भरे थे…लेकिन जल्द ही ये अहसास हो गया कि राजनीति की ये जमीं उतनी नरम नहीं है…यहां हर दूसरा कदम कभी रेत की फिसलन पर तो कभी पथरीली जमीं पर पड़ने वाली है।

ओमप्रकाश चौधरी बड़ी बेबाकी से इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनका मुकाबला खरसिया में सिर्फ कांग्रेस से नहीं था, बल्कि स्वर्गीय नंदकुमार पटेल की उस विरासत से था, जो 30 साल से जड़ें जमायी हुई थी। पांच बार सत्तासीन पटेल परिवार और उनकी मजबूत जमीं पर कदम जमाने में उन्हें हर पल पर कड़ी मेहनत करनी पड़ी। …और अब आश्वस्त हैं कि पहली बार कांग्रेस का किला ढहेगा और वो खरिसया से जीत जायेंगे।

चुनाव के दौरान तीन से चार बड़े विवादों से उनका वस्ता भी पड़ा, चाहे उनके बयानों को लेकर हो या फिर आरोपों को लेकर….ओपी चौधरी मानते हैं कि राजनीति में ये सब चलता रहता है। पर इन सबके के बीच जिम्मेदारी और ईमानदारी के काम करना भी जरूरी है।

खरसिया की सीट को हमेशा अघरिया प्रभुत्व वाली सीट माना जाता है, लेकिन ओपी चौधरी की नजर में इस सीट का आकलन दूसरा है। वो मानते हैं कि अघरिया समुदाय के वोटों को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा, लेकिन ये भी कहना कि अघरिया वोटरों की बदौलत ही जीत-हार तय होती है, ये भी सही नहीं है। क्योंकि खरसिया में जो सबसे ज्यादा अहम किरदार है, वो ट्राइबल वोटरों का,व दस अलग जातियों के , हर बार जीत-हार की अहम कड़ी यही होते हैं और इस दफा ओपी चौधरी ने अघरिया के साथ-साथ पार्टी की उसी कमजोर नब्ज को मजबूत बनाया है और अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होने की ये भी एक बड़ी वजह रही है।

ओपी चौधरी ने खरसिया का चुनाव बिल्कुल दिल्ली वाली आम आदमी पार्टी के तर्ज पर लड़ा, जहां संगठन के साथ-साथ उनके सहयोगी और साथियों ने बिल्कुल नि-स्वार्थ भाव से अपना साथ निभाया। ओपी बताते हैं कि करीब 400 ऐसे साथी थे, जो दूर-दराज से मेरे लिए खरसिया में दो महीने तक कैंप किया। किसी ने अपनी पढ़ाई को ड्राप कर दिया, तो किसी ने नौकरी से छुट्टी ले ली, इन दोस्तों के सहयोग ने ही उन्हें संबल दिया और तैयारियों को आसान बना दिया।

सबसे कमाल की बात ये है कि चुनाव गुजर जाने के बाद भी ओपी चौधरी अपनी उसी राजनीति जमीं में रमें हुए हैं। चुनाव के दूसरे दिन जब सभी प्रत्याशी आराम कर रहे थे, तो ओपी चौधरी ने अपने क्षेत्र में पदयात्रा निकाली थी। अभी भी वो हर गांव में जाकर बैठक कर रहे हैं, कार्यकर्ताओं से मिलकर, ग्रामीणों के बीच रहकर अपनी राजनीतिक पैठ को मजबूत कर रहे हैं…। …और इसी वजह से कई लोग ये मानते है ंकि ओपी राजनीति के मैदान में लंबी पारी खेलने वाला खिलाड़ी बनेगा।

आखिर खरसिया क्यों है इतना खासमखास

खरसिया कांग्रेस का अजेय किला रहा है। 58 सालों से कांग्रेस के इस किले में कोई सेंध नहीं लगा सका। यही वो जमीं है, जहां लखीराम अग्रवाल और दिलीप सिंह जूदेव जैसे सियासी सूरवीरों को भी हार की जमीं देखनी पड़ी थी। लगातार 5 बार यहां से नंदकुमार पटेल विधायक रहे हैं। ये नंदकुमार पटेल का तिलिस्म ही था कि हर बार चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता ही चला गया। 1990 में पहला चुनाव लड़ने वाले नंदकुमार पटेल को महज 3893 वोट से जीत मिली थी, लेकिन उसके बाद उसके बाद हर चुनाव में उसी बढ़त बड़ी होती चली गयी। पिछले चुनाव में भी उमेश 39 हजार वोटों से जीते थे। जाहिर है ये आंकड़े ही खरसिया को बेहद ही खास बनाते हैं। और इस बार जब बायंग गांव का एक यंग पूर्व आइएएस ने इस तिलिस्म को तोड़ने का जिम्मा उठाया, तो ये सीट भी खास बन गयी और ये चुनाव भी अहम हो गया।

पिछले पांच चुनावों के परिणाम

2013 कांग्रेस उमेश पटेल बनाम डॉ. जवाहरलाल नायक (बीजेपी) 38,888

2008 कांग्रेस नंदकुमार पटेल बनाम लक्ष्मीदेवी पटेल (बीजेपी) 33,428

2003 कांग्रेस नंदकुमार पटेल बनाम लक्ष्मीप्रसाद पटेल (बीजेपी) 32,768

1998 कांग्रेस नंदकुमार पटेल बनाम यशवंतराज सिंह (बीजेपी) 17,198

1993 कांग्रेस नंदकुमार पटेल बनाम गिरधर गुप्ता (बीजेपी) 19,159

1990 कांग्रेस नंदकुमार पटेल बनाम गिरधर गुप्ता 3893