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केशरवानी से किसकी ‘विजय’

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– नथमल शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

बिलासपुर। आखिर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने नए जिला अध्यक्ष बना ही दिये। कई जगह बदले तो कई जस के तस ही । यहां के जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी विजय केशरवानी को दी गई है।ये विजय की खासियत है कि वो अभी तक छात्र नेता और युवा नेता कहलाते हैं।प्रदेश की राजनीति में चरणदास महंत के साथ हैं और खुद को राष्ट्रीय नेता दिग्विजय सिंह का फालोवर बताने में संकोच नही करते।
गुटीय सन्तुलन के नज़रिए से देखा जाए तो यह कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं है। पूर्व जिला अध्यक्ष राजेंद्र शुक्ला भी महंत समर्थक थे/हैं। राजेन्द्र को बिल्हा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना है। प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने काफ़ी पहले ही नीतिगत फैसला ले लिया था कि जिन्हें चुनाव लड़ना है वे संगठन की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएं। यानी अपना पूरा ध्यान चुनाव लड़ने पर ही लगाएं । इसलिए राजेन्द्र शुक्ला से जिला अध्यक्ष का पद लेकर विजय केशरवानी को दे दिया गया। जिला अध्यक्ष का यह पद बहुत जिम्मेदारी और गरिमामय पद है। डॉ श्रीधर मिश्र, चित्रकान्त जायसवाल, रोहिणी कुमार बाजपेयी, बी आर यादव,बलराम सिंग, बैजनाथ चंद्राकर जैसे बेहद सम्मानीय और अनुभवी नेता यह जिम्मेदारी बखूबी सम्हाल चुके हैं। हालांकि शौकत अली चिश्ती को भी बी आर यादव यह पद दिल चुके थे। यह सब मध्यप्रदेश के जमाने की बात है। छत्तीसगढ़ में श्री चन्द्राकर और फिर राजेन्द्र शुक्ल ने यह जिम्मेदारी निभाई। अब इस पद पर विजय केशरवानी है। श्री केशरवानी के लिए यह अग्निपरीक्षा ही है। जिम्मेदारी को निभाना और पद की गरिमा को बनाये रखना । वरिष्ठ कांग्रेसी इसे किस तरह लेते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा। एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री महंत अब तक बिलासपुर जिले से किनारा किये हुए ही है। राजेंद्र शुक्ला भी उनके कोई कार्यक्रम या बैठकें यहां नही करवा सके । शायद इसलिए कि यहां अटल श्रीवास्तव का दबदबा है। कांग्रेस का जिला संगठन अटल के ऑफिस से ही चलता है और अटल तो प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के समर्थक हैं। विजय केशरवानी किस हद तक कांग्रेस जनों को जोड़ पाएंगे और अपने नेता श्री महंत को बिलासपुर जिले में ला पाएंगे यह भी चुनौती ही है। हालांकि यह चुनावी वर्ष है और सभी कांग्रेसी एकजुट हैं यह भी कहा जा रहा है।
कांग्रेस संगठन की भूमिका चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण होगी ऐसा नए राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के हवाले से कहा जा रहा है। लेकिन बूथ लेवल पर अभी तक वह सक्रियता तो नज़र आती नहीं। जबकि भाजपा ने सारे बूथ पर मज़बूत तैयारी कर ली है और प्रबंधन के अगले कदम की ओर बढ़ चले हैं। यह भी बहुत बड़ी चुनौती है विजय केशरवानी के सामने। इसलिए भी कि अब तक कि परम्परा रही है कांग्रेस में संगठन नहीं अपितु प्रत्याशी को चुनाव लड़ना होता है। बाकी सारे लोग टांग खिंचाई में लगे रहते हैं। राहुल गांधी की कांग्रेस में ऐसा नहीं होगा,कहा जा रहा है। केशरवानी को अध्य्क्ष बनवाकर तो श्री महंत ने “विजय” प्राप्त कर ली पर इस विजय से किसकी विजय हो पाती है। या केशरवानी किसको या किस किसको विजय दिलवा सकते हैं यही सबसे बड़ी चुनौती है।
एक बात और, कांग्रेस संगठन में वह जुझारू पन भी नहीं दिख रहा। जनता के लिए लगातार लड़ने,भिड़ने,उनकी समस्याओं को उठाने में कांग्रेस की सशक्त विपक्ष की भूमिका लोगों को दिखती नहीं। किसी आंदोलन को लगातार चलाया ही नहीं जाता। मुद्दे उठाए जाते हैं, प्रदर्शन भी किये गए। ज्ञापन भी दिए गए । और फिर मामला ठंडा या गायब! शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी,नाली,बिजली, सड़क,सीवरेज, सफाई जैसे बुनियादी मुद्दों पर कांग्रेस ने कोई महत्वपूर्ण या बड़ा आंदोलन किया हो लोगों को याद नहीं पड़ता। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर तो कभी ज्ञापन से आगे बात ही नहीं बढ़ी।मतदाता सूची में नाम जुड़ने काटने का मुद्दा भी कम गम्भीर नहीं। भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय जहां नियमित रूप से खुलता है, ज्यादातर बैठकें वहीं होती हैं। जबकि कांग्रेस का कार्यालय महीनों नही खुलता। वहां शायद कोई नियमित कर्मचारी ही नहीं हैं। नेताओं की जयंती पर चंद लोग जुटते हैं बस। वार्डवार कोई जानकारी नहीं होती वहां। संगठन को अपने सभी पार्षदों की बात सुनने की भी फुर्सत नहीं। संगठन की इन सब सब जिम्मेदारियों पर केशरवानी किस तरह “विजय” प्राप्त करते हैं यह भी देखना होगा। साथ ही महत्वपूर्ण यह भी कि इस पद पर स्वयं को गरिमामय, गंभीर और जिम्मेदार भी तो दिखाना होगा कांग्रेसियों के बीच भी और जनता के बीच भी । क्योंकि अभी तक केशरवानी एक छात्र नेता की छवि से उबर नहीं पाए हैं और जिला अध्यक्ष का पद बहुत ही जिम्मेदारी भर होता है।

-लेखक ईवनिंग टाईम्स के संपादक हैं

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