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सियासत से हारा ‘सुप्रीम’ फैसला

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-रितेश झा

लेखक- स्वतंत्र पत्रकार हैं

शाहबानो से लेकर एससी/एसटी एक्ट तक कुछ भी नहीं बदला…वो साल 1986 था…ये साल 2018 है…32 साल गुजर चुके हैं…लेकिन राजनीति आज फिर उसी मोड़ पर खड़ी है…जहां 32 साल पहले थी…इतिहास अब खुद को फिर से दोहराने जा रहा है। ‘सुप्रीम’ फैसले पर सियासत फिर से भारी पड़ने जा रही है। तब राजीव गांधी की अगुवाई वाली धर्मनिरपेक्ष सरकार सत्ता में थी…आज पीएम मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में है… SC/ST एक्ट पर शीर्ष अदालत के फैसले को पलटने के लिए सरकार संसद के इसी सत्र में संशोधन बिल लाएगी…कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी दल इसके लिए सरकार पर दबाव डाल रहे थे…विपक्षी दलों की बात छोड़ दें तो एनडीए के घटक दल यहां तक कि बीजेपी के दलित सांसद भी ‘सुप्रीम’ फैसले से नाराज थे। वे भी अपनी सरकार पर दबाव डाल रहे थे…और किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकने का दावा करने वाली सरकार झुक गई…संशोधन बिल लाने के लिए राजी हो गई। ऐसे समय में जब हर दल खुद को अंबेडकर का सबसे बड़ा अनुयायी साबित करने में लगा हुआ है…2019 का चुनाव भी नजदीक है..ऐसे में दलितों को नाराज करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता था। बीजेपी और पीएम मोदी भी इससे अलग नहीं हैं। इसलिए सरकार ने बेहद समझदारी दिखाते हुए संशोधन बिल लाने का फैसला किया। बिल पेश होना तो केवल औपचारिकता है…मौखिक रूप से तो ये पहले ही पास हो चुका है। सब पहले ही अपनी-अपनी रजामंदी जता चुके हैं। एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने वाले नामदार…कामदार…और मफलरमैन सब बिल के समर्थन में सुर से सुर मिलाते हुए नज़र आएंगे…एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोसने वाले धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी दल एक ही घाट पर पानी पीते हुए नज़र आएंगे। एक-दूसरे से गलबहियां करते हुए नज़र आएंगे…हालांकि ये प्यार भी थोड़ी देर का ही होगा…बिल पास होते ही इसका श्रेय लेने के लिए सब फिर से लड़ने लगेंगे…नेताओं की चिकचिक फिर से चिर परिचित अंदाज में सुनाई देने लगेगी…वो एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोसना…लानत-मलामत करना…मर्यादा की सीमाएं लांघकर एक-दूसरे के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करना…सब कुछ पहले की ही तरह हो जाएगा…ये मेल-मिलाप तो बस चार दिन की चांदनी है…बहरहाल, अगर संशोधन बिल की बात करें तो लेफ्ट से लेकर राइट और मध्यममार्गी सब एक साथ हैं…दलितों को लेकर उनका प्रेम देखते ही बन रहा है…दलितों पर होने वाले अत्याचार पर उनके कलेजे में जो टीस उठती है…उसकी चुभन उन्हें सोने नहीं दे रही है…हालांकि हकीकत क्या है…इससे हर कोई वाकिफ है..सवाल वोट बैंक का जो है..और जब बात वोट बैंक की हो तो फिर राजनीति सोचने का समय नहीं लेती है…उसके शब्दकोष में अगर-मगर की कोई जगह नहीं होती है। उसकी आंख पर केवल वोट का चश्मा पड़ा होता है…वो अपने ‘वोट पर चोट’ किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकती है…फिर चाहे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही क्यों न पलटना पड़े…कानून की तमाम धाराओं को ही क्यों न बदलना पड़े…वैसे इसी देश में जनहित के न जाने कितने ही कानून सालों से संसद की भूल-भुलैया में घूम रहे हैं…उन्हें बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं मिल रहा है…यूं भी कहा जा सकता है कि उन्हें जान-बूझकर अटका दिया गया है…क्योंकि उनके साथ उस तरह का वोटबैंक नहीं जुड़ा हुआ है…जिस तरह का वोट बैंक अल्पसंख्यकों और दलितों से जुड़े मामलों में देखने को मिलता है…इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी जैसे फैसलों को साहसिक बताकर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार भी इस मामले में चुप्पी साध लेती है…एनआरसी लागू करने के मसले पर विपक्षी दलों पर साहस नहीं जुटा पाने का आरोप लगाने वाली सरकार की खुद की हिम्मत वोट बैंक की राजनीति के आगे दम तोड़ देती है…56 इंच वाली सरकार का सीना अचानक से सिकुड़ जाता है…टीवी पर साहसिक बयान देने वाले उसके बयानवीरों की जुबां पर ताले लग जाते हैं और वो खामोश हो जाते हैं…सवाल सत्ता का  जो है… 2019 में फिर से दलितों-पिछड़ों का वोट हासिल कर सत्ता में काबिज होने का सपना देख रही मोदी सरकार में उन्हें नाराज करने का साहस नहीं है। इसलिए ये तय है कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला इतिहास का हिस्सा हो जाएगा। राजनीति तब भी जीत गई थी…राजनीति अब भी जीत जाएगी…तब मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर सियासत ने सुप्रीम कोर्ट को हराया था और इस बार एसी/एसटी के वोटों की चाहत सुप्रीम फैसले पर भारी पड़ेगी…काश कि ऐसी ही चाहत सालों से संसद में अटके महिला आरक्षण बिल के मामले में भी देखने को मिलती…दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में सोचने की इतनी बेताबी भूख से तड़प रहे लोगों के लिए सोचने में दिखाई देती…रेप जैसे संवेदनशील मसलों पर रेप पीड़िताओं के जख्मों पर नमक छिड़कने वाले बयानवीरों को सजा दिलाये जाने के मामले में देखने को मिलती…

(ये लेखक के अपने विचार हैं)