सिंहदेव जी.. यह माफी है.. तो खेद क्यों नही.. दुख शब्द क्यों ?

रायपुर 29 अगस्त 2019। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव और छजका सुप्रीमो अजित जोगी के बीच हालिया दिनों जो पत्र व्यवहार हुआ है, वह बेहद दिलचस्प है। दोनों के बीच जो तलवारें खींची रहती हैं, उस तेग़ की धार बेहद ही तेज है। तारीख़ों में दर्ज है कि कैसे जोगी जब नगरीय निकाय के दौरान एक शख्स के प्रचार में दिल्ली से अंबिकापुर पहुँचे थे तो उन्हे किस तरहा उन्हे धक्का दिया गया… बेअदबी मुकम्मल होती पर खैर खैर खुदा खुदा कर के उन्हे सुरक्षित बाहर लाया जा सका.. और तारीख़ों में यह भी दर्ज है कि कैसे अपने त्रिवर्षीय शासनकाल में उन्होने कभी सर्वशक्तिमान माने जाने वाले पैलेस को घूटनों के बल ला खड़ा किया था।
बावजूद इसके कि सियासत में मर्यादा नैतिकता बस निष्प्रभावी जुमले की तरहा हैं, लेकिन सिंहदेव ने अपनी विनम्र शैली और गजब के धैर्य का मुकम्मल प्रयोग किया। यह वक्त की जरुरत भी थी।
जबकि जोगी शासनकाल था, उत्तर छत्तीसगढ के जाने माने सहाफ़ी योगेश मिश्रा ने खबर लिखी
“क्या फिर लौटेंगे सरगुजा राजपरिवार के दिन”
खबर का यह शिर्षक कोई नही भूलेगा.. और यह भी भुलाए नही भूलता कि कैसे तब मुख्यमंत्री रहे अजित जोगी पैलेस आएँ.. कोठीघर पहुँचे और वक्त दें..इसके लिए क्या चिरौरी नही हुई। पूरी ठसन और अकड़ के साथ खड़े अजित जोगी को कोठीघर में उनकी थाली में इसरार के साथ खिलाते सिंहदेव को देखना और मनुहार के इस भाव को जोगी का चेहरा बता रहा था कि वे किस रुप में ले रहे हैं। अजीब सी आत्मसंतुष्टी का भाव जोगी के चेहरे पर था। तब सीएम जोगी ने अगर एक कौर भी खाया तो यह मुकम्मल साबित कर के खाया कि “ऐहसान” कर रहे हैं। जिस टीएस को अविभाजित मध्यप्रदेश के दिग्गी शासनकाल में सरगुजा का सीएम कहा गया माना गया.. छत्तीसगढ़ बनते ही.. पूरी कांति ही लुप्त हो गई। जिसके आने की आहट से दरवाज़े खुलते थे.. उस सिंहदेव को जोगी ने घंटों इंतजार कराया, और एक बार नही कई बार कराया। सियासत में गाली देकर हाथ पाँव लाठी चलाकर ही अपमानित नही करते, यह सरगुजा पैलेस और उनके समर्थकों ने मुकम्मल महसूस कर लिया। यह वह दौर था जब कभी सर्वशक्तिमान रहा सरगुजा पैलेस हर क़दम ज़हर के घूँट पी रहा था.. बेहद अपमान का दौर..।
सिंहदेव सदैव सीखते हैं.. विनम्रता धैर्य और बेहद मीठा सुर उनके राजसी रक्त में ही विरासत से मौजुद है। सिंहदेव के लिए यह वक्त बेहद मुश्किल रहा था.. बेहद बेहद मुश्किल। और तब जबकि 2003 का चुनाव बिलकुल सामने था.. जोगी ने उस सिंहदेव को धौरपुर के मंच से संबोधित करते हुए कहा –
“वित्त आयोग अध्यक्ष टी एस सिंहदेव”
पूरे तीन बरस सिंहदेव और उनके समर्थक किनारे फेंके गए.. हाल यह था कि चुन चुन कर उन्हे निपटाया गया जिन्हे सिंहदेव का समर्थक माना गया फिर वो सरकारी हो या गैर सरकारी।
ऐन वक्त पर दिया गया वित्त आयोग का पद रेणुका नदी के पानी को नही रोक पाया और कहा जाता है कि.. एक बैठक हुई जिसमें इस बात पर पूरा विमर्श हुआ कि, तीन बरस झेलने के बाद अब इस चुनाव में क्या करें..तो फैसला यह हुआ कि.. इस बार कोई फ़रमान जारी नही होगा कि किसे वोट दिया जाना है.. सभी स्वतंत्र हैं जिसे जो पसंद आए उसे वोट दिया जाए। आखिर तीन बरसों में हर दिन सैकड़ों बरस के बराबर अपमान के फिर दोहराव के लिए कौन तैयार होता.. नतीजतन कांग्रेस पर कम और जोगी पर ज्यादा हमलावर हुई भाजपा और उसके प्रचार तंत्र को उत्तर छत्तीसगढ में इस बैठक से वो नतीजा मिला जो इतिहास में दर्ज हो गया, कांग्रेस के गढ़ सरगुजा में जोगी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को करारी हार मिली। दिलचस्प है कि इस हार को आज भी जोगी की हार कहा जाता है कांग्रेस की नही।
विपक्ष में आने के बाद भी तकरार होती रही.. बस फर्क इतना था कि अब जोगी सर्वशक्तिमान नही रह गए थे।कांग्रेस के भीतर व्यापक उठापटक चलती रही। कांग्रेस के भीतर जोगी के होते हुए जोगी को नकारने और हैसियत शून्य कर देने की वही रणनीति अपनाई गई जो जोगी शासनकाल में सरगुजा पैलेस के साथ हुई थी। राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि भूपेश बघेल भले जोगी को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाने वाले ट्रैफ़िक हवलदार बने लेकिन रॉंग साईड ड्रायविंग के लिए भारी जुर्माना जो कि जोगी को अंतत: कांग्रेस से बाहर के रुप में था उस जुर्माने के लिए आलाकमान को ’अंग्रेजी’ में समझा कर सहमत करने वाले सिंहदेव ही थे।
कड़वाहट के ना गिने जा सकने वाले हर्फों के बीच जब यह अफवाह तेज़ी से दौड़ी कि जोगी की कांग्रेस वापसी हो सकती है यह सिंहदेव थे जिनका बयान आया
“यदि ऐसा हुआ तो.. फिर नमस्ते.. मैं घर बैठना पसंद करुंगा”
सियासत में कहा नही जाता.. महसूस कराया जाता है.. और दोनों ने ही याने सिंहदेव और जोगी ने एक दूसरे को मुकम्मल महसूस कराया है। पर शब्दों की माया भी गजब है।जोगी के जाति को लेकर आईएएस डीडी सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने जोगी को आदिवासी मानने से इंकार किया तो प्रतिक्रिया देते हुए सिंहदेव ने कहा
“यह सब जानते हैं उनके पिता सतनामी थे.. पर उनका आग्रह रहा है कि वे अपनी माँ के कुल से जाने जाएँ.. और यहाँ पितृसत्तात्मक प्रणाली है”
और उसके बाद जोगी का पत्र वायरल हुआ जिसके शब्द बेहद दिलचस्प थे.. अजित जोगी ने लिखा –
“मेरे आपसे पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं..अत: मैं चाहूँगा कि आप गलती स्वीकार कर इसका खंडन करें.यदि ऐसा नही होता है तो हमारे अच्छे पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों के बावजूद अपने सम्मान की रक्षा के लिए मुझे न्यायालय में IPC की धारा 479 और 500 के अंतर्गत अवमानना का प्रकरण दायर करना होगा.. जिसमें जेल की सजा का प्रावधान है”
इसके ठीक बाद सिंहदेव का जवाबी पत्र आया… शब्दों की जादूगरी सिंहदेव के पत्र में भी थी.. सिंहदेव ने लिखा
“हमारे पारिवारिक व व्यक्तिगत संबंध एवं मान सम्मान जैसा आपने ‘भी’ पत्र में जिक्र किया “पूर्व से बने रहे हैं” और आशा करता हूँ “पूर्व की भाँति आगे भी बने रहेंगे” जाने अनजाने में मेरे किसी कथन या बयान से यदि आपकी भावनाएँ किंचित मात्र भी आहत हुई हैं तो मैं दुख व्यक्त करता हूँ”
अजित जोगी का पत्र दावा कर रहा है कि अच्छे पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंध रहे हैं “खंडन” करिए, और सिंहदेव का पत्र जोगी के पत्र का हवाला देकर कह रहा है कि जैसा कि आपने “भी” जिक्र किया है.. खंडन ना कर केवल “दुख” जता रहा है।
जो जोगी और सिंहदेव की सियासत से हटकर व्यक्तिगत हो चुकी रंजिश को जानते हैं.. वे अच्छे पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों के दावे पर चौंकेंगे.. और खंडन तलाशेंगे जो कि सिंहदेव के पत्र में कहीं नही है।
शब्दों की बाज़ीगरी के साथ दो पत्र छत्तीसगढ की सियासत में नुमाया हैं.. और दिलचस्प हैं..

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