कलेक्टर नीलेश बोले- विरासत की विविधता को बचाना होगा…… दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

जशपुर16 जून 2019/ जशपुर नगर में पुरातत्व एवं पर्यावरण विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कलेक्टर एवं जिला पुरातत्व संघ के अध्यक्ष श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने कहा कि इसके माध्यम से पुरातत्व एवं पर्यावरण व संरक्षण के संबंध में मिले सुझावां को अमल में लाया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न क्षेत्रों की अपनी विविधताएं होती है। देश के अन्य क्षेत्रों के समान जशपुर जिला भी विविधताओं से परिपूर्ण हैं। यहां बहुत सी जनजातियां रहती है, जिनकी अपनी कला, संस्कृति, बोली, खान-पान और परिधान आदि हैं। वर्तमान दौर में इनका तेजी से क्षरण हो रहा है। हालात यह हैं कि आगामी 15-20 सालों में इन विविधताओं के विलुप्त हो जाने का अंदेशा मंडराने लगा है। उन्होंने कहा कि अपनी विरासत की विविधता और पहचान को बनाए रखने के लिए इनका संरक्षण एवं संवर्धन जरूरी है। कलेक्टर ने कहा कि जशपुर जिले की विविधता को संवारने का काम सबके सहयोग से जारी रहेगा। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों सहित छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न अंचलों के लगभग 150 इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं, पर्यावरणविदों, शोधार्थियों सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजनों ने भाग लिया।
संगोष्ठी में महाराष्ट्र पुणे से आए डॉ. सचिन चावन, डॉ. प्रीतम ने चिकित्सा की प्राचीनतम पद्धति आयुर्वेद एवं योग के बारे में जानकारी दी। डॉ. चावन ने कहा कि आयुर्वेद का ही अनुसरण मार्डन साईंस कर रहा है। उन्होंने कहा कि जशपुर जिला वनौषधि की उपलब्ध संभावना जताई। संगोष्ठी में फ्रांस की गेल मुराका एवं रायपुर की स्वीटी ठेठेवार ने ग्रीन विलेज प्रोजेक्ट के बारे में अपना व्याख्यान दिया। समापन अवसर पर कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने संगोष्ठी के पेनलिस्ट डॉ. आभारूपेन्दर पाल (एचओडी इतिहास संकाय पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर), प्रो.के.के. अग्रवाल,  नरेन्द्र यादव, डॉ.विजय रक्षित, संगोष्ठी के संयोजन श्री शिखर श्रीवास्तव सहित डॉ. सचिन, डॉ. प्रीतम, डॉ. राना.एन.राय, गेल मुराका, प्रगति पल्लवी, डिप्टी कलेक्टर आर.एन.पाण्डेय, रोपण राम अगरिया बन्धु को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित करने के साथ ही शोधार्थियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए।
जशपुर नगर के जिला पंचायत ऑडिटोरियम में आयोजित इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस बिलासपुर से आए श्री सतीश जयसवाल ने नदियां के वर्तमान स्थिति, प्रो. के.के.अग्रवाल अम्बिकापुर ने छत्तीसगढ़ में जल प्रबंधन की स्थिति पर अपने व्याख्यान में कहा कि यह क्षेत्र वर्षा आधारित क्षेत्र हैं। तालाब और कुंए ही जल के प्रमुख स्त्रोत है। प्रो.अग्रवाल ने गुप्तकाल, कलचुरीकाल में तालाबों के निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि रतनपुर को तालाबों का शहर कहा जाता है। यहां कलचुरीकाल में 1400 तथा रायपुर में 1200 तालाब हुआ करते थे। आबादी बढ़ने के साथ ही तालाबों का अस्तिव खत्म होता गया। आज गिनती के तालाब बचे है। उन्होंने कहा कि गांव में आज भी तालाब निस्तारी के प्रमुख स्त्रोत हैं। प्रो.अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ की आदिमजनजातियां का संबंध मौखिक स्त्रोत के आधार पर रामायण एवं महाभारत से जु़ड़ा मिलता हैं। आदिम संस्कृति को लिखने के लिए उन्होंने मौखिक स्त्रोत पर काम करने की जरूरत बताई।
जशपुर नगर के ग्रीन नेचर वेलफेयर सोसायटी के सैयद कैसर हुसैन ने अपनी संस्था द्वारा जशपुर जिले में पशु-पक्षियों, वन सम्पदा के संरक्षण एवं संर्वधन के लिए किए जा रहे कार्यां के साथ ही पावर प्वाइंट प्रजेटेंशन के माध्यम से सांपों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। श्री हुसैन ने कहा कि जशपुर जिले में 24 प्रजाति के सांप मिलते हैं। जिसमें कॉमन करैत सर्वाधिक जहरीला होता है। सर्पदंश से होने वाली 90 प्रतिशत् मौत कॉमन करैत के डसने से होती है। पंडित रवि शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की शबाना अहमद ने शिक्षा एवं संस्कृति, पत्रकार विश्वबंधु शर्मा ने समाजिक संस्था संवेदना द्वारा जशपुर जिले में किए जा रहे समाजिक सरोकार के कार्यां पर प्रकाश डाला और कहा कि जशपुर जिले के तमता पहाड़ी में पाषाणकालीन सभ्यता के प्रमाण विद्यमान होने को यह बात अब पुरातत्व विभाग एवं प्रशासन मानने लगा है। हिदायतुल्ला यूनिवर्सिटी के सहायक प्राध्यापक राना एन राय ने पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधान के बारे में शोध-पत्र प्रस्तुत किया। शोधार्थी सुशीला कुजूर ने कहा कि प्रकृति का संतुलित दोहन हमारी समाजिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। रंजित कुमार ने शिक्षा के विकास में ईसाई मिशनरी के योगदान, हेमलता साहू ने बीएनसीमिल राजनांदगांव के प्रदूषण, पुरोहित कुमार सोरी ने बस्तर के लोकगीत एवं डॉ.डी.एन.खुट्टे ने लोकनृत्य, डॉ.बंसोर विभूति ने वन आधारित जनजातियों के जीवन पर अपनी शोध पत्र का पठन किया। संगोष्ठी के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पेनेलिस्ट डॉ. आभारूपेन्दर पाल (एचओडी इतिहास संकाय पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर), प्रो.के.के. अग्रवाल,  नरेन्द्र यादव ने की। डॉ. रक्षित ने संगोष्ठी के समापन कार्यक्रम को संबोधित किया और कहा कि इसके माध्यम से पुरातत्व संरक्षण एवं पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने की प्रेरणा और दिशा मिली है। कार्यक्रम में अगरिया समाज के रोपण बंधु द्वारा समाज के लोकगीत की प्रस्तुत दी गई। इस अवसर पर अनिता गुप्ता के काव्य संग्रह ’सजल’ का विमोचन भी हुआ।

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